
जेके भाटी/जोधपुर. कोराना महामारी के कारण लगे लॉकडाउन ने लोगों की स्थिति खराब कर दी हैं। इस कठिन परिस्थिति में काम ठप हुआ तो दो वक्त की रोटी के लिए लोगों ने अपना काम-धंधा ही बदल दिया। लोग पुराना काम छोडक़र नए काम को करने को मजबूर हो गए हैं। लॉकडाउन से पहले सुन्दर सिंह खींची जर्मन भाषा के गाइड का काम कर अपना जीवन यापन कर रहे थे। लॉक डाउन में पर्यटकों का आना बंद हुआ तो अब पेट पालने के लिए अपना धंधा बदलते हुए खेतों में चल रही फसलों की कटाई करके आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति करने में जुट गए हैं।
32 वर्षो से कर रहे गाइड का काम
शहर के गोकुलजी की प्याऊ चैनपुरा निवासी सुन्दरसिंह खींची पिछले 32 वर्षो से गाइड का काम कर रहे है। उन्होंने जर्मन भाषा का कोर्स कर ये भाषा सीखी। वे खास तौर पर जर्मन से आने वाले पर्यटकों को गाइड करते थे। लॉकडाउन के बाद फ्लाइटें बंद होने से पर्यटकों का आना शहर में बंद हो गया। जिससे घर चलाने का संकट मंडराने लगा और काम बदलने को मजबूर कर दिया। उन्होंने बताया कि एक टूरिस्ट सीजन तो लॉकडाउन में जैसे-तैसे निकाल लिया। लेकिन अब अनलॉक होने के बाद भी आगामी नवम्बर-दिसम्बर के टूरिस्ट सीजन में फ्लाइटें शुरू नहीं होने व पर्यटकों के नहीं आने से संकट ज्यादा मंडरा रहा हैं। उन्होंने बताया कि सबसे ज्यादा समस्या तो उन गाइड को आ रही है जो उधार रुपये लेकर विदेशी लेंगवेज का कोर्स करके आए है। जर्मन, फ्रेंच, इटालिन जैसी भाषा सीखने वाले गाइड बड़ी मुश्किल में हैं। ऐसे में सरकार भी टूरिस्ट गाडड के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठा रही है।
तीन माह में उगाया चारा
खींची ने बताया कि लॉकडाउन में बदले काम में अभी खेती-बाडी पर ध्यान दे रहा हूं। अपने गांव के खेत में पशुओं के लिए चारा उगाया है। खेत में उगे चारे की कटिंग कर बाजार में ले जाकर बेच रहा हूं, जहां चारे के अस्सी-नब्बे पैसे मिल रहे हैं। जिससे घर चलाना मुश्किल हो गया हैं। ये मेरी तीन महीने की कमाई है और कोई साधन नहीं है। अनलॉक होने के बाद भी स्थिति सुधरने में अभी बहुत समय लगेगा। तब तक इससे ही गुजारा करना पडेगा। कुछ काम न होने से यह काम बेहतर है। कम से कम घर का खर्च तो चल रहा है।