जोधपुर. इतिहास के पृष्ठों में ही अंकित होकर रह गई जोधपुर नगर के लिए प्रमुख जल स्रोत रही कई बावड़ियां उचित देखभाल न होने से कई खण्डहर हो चुकी है तो कई कूड़ा – कचरा डालने का पात्र बनाकर पाट दी गई। उन्हीं में से एक उम्मेद उद्यान में िस्थत “नौलखा” भी है जो दशकों से कचरे में दबी पड़ी थी। अब ऐतिहासिक कलात्मक बावड़ी “नौलखा” को भामाशाहो के सहयोग से मौलिक स्वरूप देने की तैयारियां शुरू कर दी गई है। विशेषज्ञ आर्किटेक्ट अनु मृदुल की देखरेख में जुटे अनुभवी शिल्पकार फिर से 300 साल प्राचीन स्वरूप देने में लगे है। प्राचीन कलात्मक जलाशय के सुधरने से पर्यटन क्षेत्र में खुलेगी नई राह खुल सकती है।
अभयसिंह के कार्यकाल में बनी थी बावड़ीउद्यान परिसर में महाराजा अभयसिंह के कार्यकाल के दौरान नौ लाख रुपए की लागत से निर्मित कलात्मक बावडी काई, कचरे व कीचड से अटी पड़ी है । वर्ष 1935 में पब्लिक पार्क बनने के बाद और बाद में जंतुआलय निर्माण होने पर जंतुआलय के सभी वन्यजीवों और वन्यजीवों के लिए बने हौद एवं पिंजरा परिसर में छिड़काव के लिए ही ‘ नाैलखा ‘ का पानी प्रयुक्त किया जा रहा था।
पहले भी हो चुके है असफल प्रयास
उम्मेद उद्यान परिसर में बनी प्राचीन “नौलखा” बावड़ी के दूषित पानी को पीने योग्य बनाने के लिए दो दशक पूर्व नगर सुधार न्यास की ओर से फिल्टर प्लांट योजना वित्तिय स्वीकृति जारी नहीं होने से मामला ठंडे बस्ते में चला गया ।
अर्से से नहीं हुई सफाई
वर्ष 1980 में तत्कालीन जंतुआलय अधीक्षक वाईडी सिंह के नेतृत्व में “नौलखा” की सफाई के बाद इसे पूर्ण रूप से विशाल लोहे की जाली से ढका गया था । दो दशक बाद 2001 में जोधपुर के तत्कालीन जिला कलक्टर रजत मिश्र के निर्देश पर “नौलखा” की मरम्मत कराई गई । उचित रख – रखाव के अभाव में बावड़ी के कई कलात्मक स्तंभ गिरकर बावड़ी के तल में पहुंच चुके थे। जल स्वावलंबन योजना में भी तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने बावड़ी के पास शिलापट्ट का शुभारंभ किया था लेकिन हालात जस के तस रहे।
इनका कहना हैनगर निगम की अनुमति से भामाशाहों व हिन्दूजा फाउण्डेशन के सहयोग से करीब 300 साल प्राचीन “नौलखा” बावड़ी की सफाई व मरम्मत कार्य विशेषज्ञ शिल्प कारों के सहयोग से पुरानी परम्परा अनुसार किया जा रहा है। आगामी माह में यह कार्य पूरा कर लिया जाएगा।
अनु मृदुल, विशेषज्ञ वास्तुविद
इंटेक भी सहयोगीइंटेक ने पांच साल पहले जोधपुर के प्रमुख जलाशयों के संरक्षण की शुरुआत की थी। उसी कड़ी में “नौलखा” बावड़ी की सफाई में इंटेक भी सहयोगी है। जो कलात्मक स्तंभ बावड़ी में गिर चुके थे उन्हें पुन: मौलिक स्वरूप में लाया जा रहा है। इस प्रोजेक्ट में भामाशाह ही प्रमुख सहयोगी है। इंटेक संरक्षक गजसिंह के संरक्षण में बनाई समिति के मार्गदर्शन में अब तक 10 बावडियों की सफाई और तीन जल स्त्रोत जाडेची जी का झालरा , सूरज कुंड और अब नवलखा का जीर्णोद्वार हो रहा है । इंटेक की ओर से बावड़ी को गोद लिया गया था लेकिन कोविड के कारण कार्य शुरू नही हो सका लेकिन अब जोधपुर के प्रमुख वास्तुविद अनु मृदुल के प्रयासों से जीर्णोद्वार का कार्य शुरू हुआ है ।
डॉ. एमएस तंवर , इंटेक कन्वीनर जोधपुर चेप्टर