
पितृपक्ष के दौरान मप्र के निमाड़ अंचल में मनाए जाने वाले संझा लोक पर्व की गूंज अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गूंजेंगी। संझा पर्व पर केंद्रित एक डाक्यूमेंट्री का फिल्मांकन किया जा रहा है। विश्वरंग फाउण्डेशन के लिए इस फिल्म का छायांकन पोडियम मीडिया एंड मेनेजमेंट प्रा. लि. भोपाल की युवा टीम कर रही है। शूटिंग यूनिट इन दिनों खंडवा, खरगोन तथा महेश्वर के आसपास गांवों में संझा पर्व के दृश्यों को कैमरे में कैद कर रही है।
देशज धरोहर के दस्तावेजीकरण की विशेष परियोजना के तहत निमाड़ की जनपदीय संस्कृति के कलात्मक पहलुओं को सहेजती यह फिल्म शिक्षाविद-संस्कृतिकर्मी डॉ. संतोष चौबे के मार्गदर्शन में बन रही है। क्रिएटिव डायरेक्टर तथा कोऑर्डिनेटर युवा फिल्मकार आदित्य उपाध्याय हैं। अतिशय जैन, हेमांग कुरील, समर्थ जोशी और विभोर उपाध्याय तकनीकी टीम में शामिल हैं। निमाड़ के लोकरंगों से सजे इस चलचित्र की परिकल्पना तथा पटकथा कला समीक्षक विनय उपाध्याय ने तैयार की है।
उल्लेखनीय है कि विश्वरंग फाउण्डेशन द्वारा इसी वर्ष निमाड़ के ‘गणगौर पर्व’ पर भी एक डाक्यूमेंट्री फिल्म का निर्माण किया जा चुका है। राष्ट्रीय फिल्म समारोह में प्रदर्शन के दौरान इस फिल्म की दर्शकों तथा कला समीक्षकों ने अत्यंत सराहना की है। संझा पर्व पर बनी डाक्यूमेंट्री फिल्म को भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शित किया जाएगा।
निमाड़ की कन्याओं का प्रिय पर्व है ‘संझा’
कहते हैं- संझा एक लोक देवी है जो हर साल अपनी सखी-कन्याओं के बीच श्राद्ध पक्ष के सोलह दिनों तक हंसी-ठिठोली करने अपने अंचल में आ पहुंचती हैं। इस दौरान किशोरियां गाय का ताजा हरा गोबर लेकर दीवारों पर चांद, सितारे, पेड़-पहाड़, पशु-पक्षी और गणेश तथा स्वास्तिक की आकृतियां बनाती हैं और उन्हें ताजे फूल-पत्तियों से सजाती हैं। शाम ढलते ही इन सुंदर सजीली आकृतियों के सामने कन्याओं की बैठक होती है और शुरू होता है सुर में सुर मिलाता संजा गीतों का कारवा।