“लड़कियां सिर्फ घर संभालने या चूडिय़ां पहनने के लिए नहीं हैं, जब वें बस और ट्रेन चला सकती हैं, तो गाड़ी रिपेयर क्यों नहीं कर सकतीं?” यह हौसला है खंडवा जिले के खालवा ब्लॉक के एक छोटे से गांव सांवलीखेड़ा की रहने वाली गायत्री कासडे का। मात्र 8वीं तक पढ़ी गायत्री ने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति से न केवल अपने परिवार की किस्मत बदली, बल्कि उन तमाम लड़कियों के लिए एक मिसाल पेश की है जो रूढिय़ों को तोडकऱ आगे बढऩा चाहती हैं।
पलायन के दर्द से आत्मनिर्भरता का सफर
खालवा ब्लॉक, जहां बेरोजगारी के कारण लगभग 80 प्रतिशत लोग पलायन करते हैं, वहां गायत्री का जीवन भी संघर्षों से भरा था। वह अक्सर काम की तलाश में गोवा, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों में पलायन करती थीं। कोरोना काल (2020-21) के दौरान जब पूरा देश बंद था, तब पलायन करने वाले ग्रामीणों और विशेषकर महिलाओं को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
‘कर्मयोगिनी’ कार्यक्रम ने बदली जिंदगी
मुसीबत के उस दौर में स्पंदन समाज सेवा समिति की डायरेक्टर सीमा प्रकाश ने इन लड़कियों के दर्द को समझा और ‘कर्मयोगिनी’ कार्यक्रम की शुरुआत की। इसका उद्देश्य उन लड़कियों को हुनरमंद बनाना था जो पढ़ाई छोड़ चुकी थीं। इस कार्यक्रम के तहत गायत्री सहित 70 लड़कियों को मोबाइल रिपेयरिंग, मोटर साइकिल मैकेनिक, ब्यूटी पार्लर और इलेक्ट्रिशियन जैसी ट्रेनिंग दी गई।
चुनौतियों को बनाया अवसर
गायत्री ने लीक से हटकर मोटर साइकिल मैकेनिक बनने का फैसला किया। शुरुआत में खालवा के 10-12 गैराज संचालकों ने यह कहकर ट्रेनिंग देने से मना कर दिया कि “यह लडक़ों का काम है।” लेकिन गायत्री ने हार नहीं मानी। आखिरकार, बाबू भैया नाम के एक मैकेनिक ने उनकी लगन देखकर उन्हें अपने गैराज में 2 महीने तक काम सिखाया।
आज हैं गांव की शान
ट्रेनिंग और स्पंदन संस्था द्वारा मिली ‘टूल किट’ की मदद से गायत्री ने अपनी खुद की दुकान शुरू की। पंचायत द्वारा मिली जगह पर वह सफलतापूर्वक गाडिय़ां रिपेयर कर रही हैं। जिस गायत्री को कभी काम की तलाश में भटकना पड़ता था, आज वह दिन के 800 से 900 रुपए तक कमा रही हैं। आदिवासी अंचल की पहली महिला बाइक मैकेनिक बनकर वह गांव की शान बन चुकी है।