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संघ शक्ति युगे युगे… द्वितीय सरसंघचालक गुरुजी का भी रहा खंडवा से नाता, प्राथमिक शिक्षा भी यहीं हुई

चरैवति... चरैवति के मूल मंत्र के साथ आगे बढ़ते गया संघ -देशभक्ति, समाज जागरण के कार्य में जुटे हुए है करोड़ों कार्यकर्ता -कभी संघ से जुड़ाव की सूचना पर सरकारी नौकरी तक नहीं मिलती थी

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खंडवा

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Manish Arora

Oct 02, 2025

विश्व का सबसे बड़ा अनुसांघिक संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ तिथि के अनुसार विजया दशमी पर अपने सौ वर्ष पूर्ण कर रहा है। कभी चंद लोगों की देशभक्ति और समाज जागरण की सोच के साथ शुरू हुए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में आज करोड़ों स्वयं सेवक समाज जागरण के कार्य में लगे है। संघ का खंडवा में भी 90 साल पुराना इतिहास है। संघ के द्वितीय सर संघचालक माधव सदाशिव गोलवरकर (गुरुजी) की प्राथमिक शिक्षा खंडवा में ही हुई है। संघ से जुड़े वरिष्ठ कार्यकर्ताओं से पत्रिका ने संघ शताब्दी वर्ष पर विशेष चर्चा की।

संघ के वरिष्ठ स्वयं सेवक सुरेंद्र अग्रवाल ने बताया संघ के द्वितीय सर संघचालक माधव सदाशिव गोलवरकर का खंडवा से नाता रहा है। उनके पिता सदाशिव भाऊ खंडवा में पोस्टमैन के रूप में कार्यरत थे। वे कुम्हारबेड़ा पर नरेंद्र पगारे वकील साहब के यहां रहते थे। गुरुजी की प्राथमिक शिक्षा खडक़पुरा स्थित मेन हिंदी स्कूल में हुई थी। सर संघचालक बनने के बाद गुरुजी साल में दो बार खंडवा जरूर आते थे। जाट मोहल्ला में छगनलाल अग्रवाल के यहां उनका प्रवास होता था, जहां मैं भी कई बार उनसे मिला हूं। वर्ष 1964-65 में इंदौर में प्रशिक्षण के लिए गया था। वहां भी गुरुजी से मुलाकात हुई। वर्ष 1940 में सरसंघ चालक बनने से पहले खंडवा की सब्जी मंडी में एक बड़ा कार्यक्रम भी उनका हुआ था।

कठिन परिस्थतियों में हुआ संघ का विस्तार
सुरेंद्र अग्रवाल ने बताया कि बचपन से ही संघ से जुड़े है। खंडवा में संघ की पहली शाखा के संयोजक उनके पिता हजारीलाल अग्रवाल रहे हैं। पहली बार उन्होंने वर्ष 1950 में संघ का गणवेश पहना। संघ का विस्तार इतना आसान नहीं था। बड़ी कठिन परिस्थितियों में इसका विस्तार हुआ है। संघ स्वयंसेवक साइकिल से गांव-गांव जाते थे और लोगों को जोड़ते थे। सबसे बड़ी कठिनाई गांधी हत्याकांड के दौरान आई थी। संघ पर गांधीजी की हत्या का आरोप लगा और पूरे देश में गिरफ्तारियां हुई। खंडवा में भी कई लोग गिरफ्तार किए गए।

सामाजिक समरसता पर काम करता संघ
संघ से जुड़े वरिष्ठ कार्यकर्ता दिलीप रामेश्वर अग्रवाल ने बताया कि उनके पिता रामेश्वर अग्रवाल 1944 से संघ से जुड़े जो मृत्यु पर्यंत 1967 तक स्वयं सेवक रहे। एक समय था जब संघ की किसी भी शाखा में 5-7 लोग आते थे, आज 500 लोग इक_े हो जाते है। संघ ने कभी किसी को जाति, वर्ग को नहीं माना, समरसता ही संघ का मूल मंत्र है। आदिवासियों के लिए सेवा भारती, वनवासी कल्याण के आयाम चला रहा है। संघ किसी धर्म का विरोधी नहीं रहा, बल्कि सनातन को संगठित किया। हिंदू एकत्रीकरण के लिए कार्य किया है।


संघ में आने से डरते थे लोग
दिलीप अग्रवाल ने बताया संघ से जुड़े लोगों को सरकारी नौकरी में तकलीफ आती थी। मैं एमपीपीएससी में क्लवालिफाइड था, इंटरव्यू में मुझसे मदर टेरेसा से संबंधित सवाल पूछे, सत्यता सामने रखी तो इंटरव्यू से बाहर कर दिया। संघ में आने से सरकारी कर्मचारी बहुत डरते थे, उन्हें प्रताडि़त किया जाता था, देशद्रोही माना जाता था। संघ को इस सोच को बदलने में 60 साल लग गए। आज परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी है और राष्ट्रवाद देशप्रेम का सबसे बड़ा स्थान संघ शाखा बन चुकी है।