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संझा पर्व… प्रकृति से मनुष्य को जोडऩे वाला पर्व हो रहा विलुप्त

-श्राद्ध पक्ष के 16 दिन आंगन की दीवार पर गोबर से उकेरी जाती है आकृतियां -शहर में तो इक्का-दुक्का परिवार, ग्रामीण में भी कुछ ही लोग मना रहे पर्व

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Manish Arora

Sep 11, 2025

निमाड़ की लोक संस्कृति में श्राद्ध पक्ष के 16 दिन संझा पर्व मनाने की भी परंपरा है। इस पर्व को प्रकृति से मनुष्य के जुड़ाव का पर्व माना जाता है। संझा में बालिकाओं द्वारा गोबर से घर के आंगन की दीवार पर विभिन्न आकृतियां उकेरी जाती है और श्रद्धा से पूजा-अर्चना कर अंतिम दिन विसर्जन किया जाता है। वर्तमान आधुनिक युग में बालिकाएं गोबर से परहेज करते हुए इस लोक संस्कृति से दूर हो रही है। शहर में इक्का-दुक्का परिवार ही परंपरा निभा रहे है। गांव में जरूर पर्व को अब भी कुछ परिवारों ने सहेज रखा है।

निमाड़ के लोक-संस्कृति पुरुष, पद्मश्री पं. रामनारायण उपाध्याय के बेटे हेमंत उपाध्याय और उनकी पत्नी साधना उपाध्याय लोककला गणगौर और लोक संस्कृति संझाको सहेजन में लगी हुई है। साधना उपाध्याय ने बताया कि संझापर्व में बालिकाएं अपने घर की दीवार पर संझा माता की प्रतीकात्मक आकृतियां बनाती है। माना जाता है कि मंगलमयी देवी के रूप में संझामाता अपने घर आती है, जिससे बालिकाएं, कन्याएं अच्छे वर की कामना से उनकी पूजा करती है। सखी के रूप में कन्याएं 16 दिन संझामाता की पूजा कर 16वें दिन विसर्जन करती है। इस परंपरा से अब बालिकाएं, कन्याएं दूर होती जा रही है। साधना उपाध्याय ने बताया कि पर्व को सहेजने उन्होंने कई साल प्रयास किए और प्रतियोगिताएं भी करवाई। अब इन दिनों बच्चों की परीक्षाएं, बच्चियों को गोबर से परहेज, इंटरनेट-मोबाइल के चलते बालिकाएं इसमें रूचि नहीं लेती।

महाराष्ट्र, हरियाणा, यूपी में भी मनता पर्व
गणेश उत्सव के बाद संझा पर्व भारत के कई भागों में मनाया जाता है। हर क्षेत्र में इसके अलग-अलग नाम हैं। महाराष्ट्र में गुलाबाई या भूलाबाई, हरियाणा में सांझी धूंधा, ब्रज में सांझी, राजस्थान में सांझाफूली या संजया के रूप में बालिकाएं संझामाता की पूजा करती है।

हर दिन अलग-अलग आकृति
श्राद्ध पक्ष के 16 दिन संझा पर्व के दौरान अलग-अलग आकृतियां गोबर से बनाई जाती है। जिसे बालिकाएं फूल, पत्ती, चमकीले कागजों से सजाती है। इसमें पूर्णिमा पर पाटलो, पड़वा पर पंखो, दूज पर बिजोरो, तीज पर घेवर, चौथ पर चोपड़, पंचमी पर 5 कुआरे, कुआरियों की आकृति, छट पर छाबड़ी, सप्तमी पर सातियो, अष्टमी पर अष्ट पंखड़ी, नवमी पर डोकरा-डोकरी, दशमी पर दीपक की जोड़ी, ग्यारस पर केल, बारस पर बंदनवार, तेरस पर खेडिय़ा बामन, चौदस पर किला कोट और अमावस्या पर संजाबाई की डोली बनाई जाती है।

खत्म होती जा रही लोकगीतों की परंपरा
संझापर्व के दौरान संझामाता के साथ सहेलियों का हंसी-मजाक, रूठना-मनाना आदि लोक गीतों के माध्यम से किया जाता है। संझाबाई का लाड़ाजी, लूगड़ो लाया जाड़ाजी, चांद गयो गुजरात हरणी का बड़ा-बड़ा दांत, छोटी-सी गाड़ी लुढक़ती जाय, जिसमें बैठी संझा बाई सासरे जाय। संझाजीमेल, चुठले.. मै जिमाऊ सारी रात, जैसे पारंपरिक लोकगीत भी अब सुनाई नहीं देते। साधना उपाध्याय ने बताया कि आकाशवाणी और दूरदर्शन पर उनकी कई बार संझागीतों की प्रस्तुति हुई है, लेकिन अब स्वास्थ्य कारणों से वे नहीं जा पाती।