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घीयर मिठाई की परंपरा कायम, सिंधी समाज में इसके बिना अधूरी होली

रंगों का पर्व होली सिंधी समाज में घीयर मिठाई के बिना अधूरा माना जाता है। पाकिस्तान के सिंध प्रांत से चली आ रही यह परंपरा आज भी पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है। सिंधी समाज द्वारा हर वर्ष की तरह इस बार भी बड़े पैमाने पर घीयर तैयार कर घर-घर पहुंचाया जा रहा है।

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– पाकिस्तान के सिंध से चली आ रही परंपरा, 4 कुंटल घीयर की इस बार बिक्री की संभावना

सिंधी समाज में होली के अवसर पर घीयर बनाने की परंपरा वर्षों पुरानी है। सिंधी समाज के प्रवक्ता कमल नागपाल ने बताया कि यह परंपरा उनके पूर्वज पाकिस्तान के सिंध से अपने साथ लेकर आए थे। समय बदला, पीढ़ियां बदलीं, लेकिन घीयर का स्वाद और उससे जुड़ी भावनाएं आज भी वैसी ही हैं। देश भर में जहां भी सिंधी समाज के लोग हैं वहां होली पर घीयर मिठाई की परंपरा है। होली पर मंदिर में भी इसी का भोग लगता है। परिवार में बहन, बेटियों के घर भी इस मिठाई को पहुंचाया जाता है। मेहमान आने पर भी उन्हें यह मिठाई विशेष रूप से देते हैं। खासतौर पर समाज में घीयर को शगुन की तौर पर माना जाता है।

महाशिवरात्रि के बाद से बन रही मिठाई

व्यवसायी नरेश दुल्हानी ने बताया कि कई वर्षों से घीयर मिठाई बनवा रहे है। क्षेत्र में चार से पांच जगह यह मिठाई बनती है। महाशिवरात्रि के दिन बाद से ही घीयर बनना शुरू हो जाता है। इस वर्ष करीब 4 कुंटल घीयर मिठाई तैयार की गई है। शुद्ध घी, मैदा और मेवे से पारंपरिक तरीके से घीयर बनाया जाता है। बड़े-बड़े कड़ाहों में इसे तला जाता है और फिर चाशनी में डुबोकर विशेष स्वाद दिया जाता है। खासबात यह है कि यह नरम नहीं पड़ती। एक माह तक इसे रख सकते हैं।