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मांदल की भाप पर झूमे आदिवासी, चांदी के गहनों और पारंपरिक नृत्य ने बांधा समां

आदिवासी संस्कृति का सबसे बड़ा पर्व भगौरिया पारंपरिक उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। जिले का सबसे बड़ा भगौरिया मेला बोरगांव बुजुर्ग में सजा, जहां मांदल की गूंजती थाप पर झूमते आदिवासी आकर्षण के केंद्र रहे। थाली की खनक और मांदल की थाप पर युवा भी झूमते रहे। पारंपरिक वेशभूषा में चांदी के गहने पहने हुए युवतियां संस्कृति के रंग में रंगी हुई रही।

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बोरगांव बुजुर्ग में सुबह से ही आसपास के गांवों से आदिवासी समाज के लोग पहुंचने लगे थे। दोपहर तक पूरा हाट मैदान लोगों से पट गया। चांदी के गहने परंपरागत परिधान पहने युवतियां मेले का आनंद लेती रही। मेले में तीन बड़े झूले और नाव झूले के सामने युवक युवतियों की लंबी कतार लगी रही। सबसे अधिक भीड़ यहां देखी गई।

20 से अधिक मांदल, समूह में पारंपरिक नृत्य

मेले में पांच स्थानों पर आदिवासी अपनी मांदल सजाकर लेकर आए थे। यहां अलग-अलग समूह में युवक युवतियों का समूह पारंपरिक नृत्य करता रहा। मांदल के थाप पर युवा कुर्राटे भरते रहे। इस उत्सव का आनंद लेने में महिलाएं और पुरुष भी पीछे नहीं रहे। तीर कमान, कुल्हाड़ी और तलवार के साथ नृत्य करते रहे।

सांसद और विधायक भी हुए शामिल

भगौरिया मेले में सांसद ज्ञानेश्वर पाटिल और पंधाना विधायक छाया मोरे भी पहुंची। सांसद ने मांदल बजाया, साथ ही हाथ उठाकर नृत्य भी किया। इसके बाद मांदल बजा रहे समाज के लोगों को राशि भी भेंट की। सांसद पाटिल ने कहा कि भगौरिया पर्व आदिवासी समाज की परंपराओं, प्रेम और सामाजिक संबंधों का पर्व है।

एक दूसरे को गुलाल लगाकर दी शुभकामनाएं

मेले में युवतियां आकर्षक साड़ी, कांचली और चांदी के गहनों से सजी थीं। युवतियां हाथों में गुलाल लिए एक-दूसरे को रंग लगाते और शुभकामनाएं देते दिखे। बुजुर्गों को तिलक लगाकर आशीर्वाद लिया। मेले में घूमते हुए युवक रंग गुलाल उड़ाते रहे।