बदलते समय के साथ भंडारों का स्वरूप भी बदला। अब भंडरों में भोजन परोसा तो जाता है, लेकिन जूठी पत्तल प्रसादी पाने वाले को खुद उठाना होती है। गणगौर पर्व पर दो समाजों में होने वाले भंडारे सामाजिक समरसता के अनुठे उदाहरण है। यहां जूठी पत्तल उठना शर्म नहीं, बल्कि गर्व का विषय है, जिसके लिए बकायदा समाजजन बोली तक लगाते है। सोमवार को गणगौर पर्व पर कहार समाज और गुरव समाज में ये परंपरा देखने को मिली।