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एक ऐसा मंदिर जहां एस्केलेटर पे सवार हो, करते हैं भगवान का अभिषेक…

समय के साथ होता गया विकास, नाम भी बदले 250 से 300 वर्ष प्राचीन बताया जाता है मंदिर आदिनाथ पुण्योदय तीर्थ क्षेत्र दादाबाड़ी नसियांजी...

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कोटा

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Suraksha Rajora

Feb 19, 2019

कोटा. देश-विदेश में धार्मिक स्थलों व मंदिरों की अपनी विशेष ख्याति हो सकती हैं। लोग अलग अलग मुरादों को लेकर भगवान के दर्शन करने भी जा सकता हैं,पर क्या कहीं किसी ऐसे मंदिर का जिक्र सुना है, जहां भगवान के अभिषेक करने के लिए भी विज्ञान की तकनीक का सहारा लिया जाता हो। यकीन कीजिए यह कोई मॉल या विशाल भवन नहीं। कोटा के दादाबाड़ी इलाके में स्थित जैन मंदिर है, जहां श्रद्धालु एस्केलेटर पर सवार होकर बड़े बाबा का अभिषेक करते हैं। दरअसल मंदिर में प्रतिमा ही इतनी विशाल है कि भगवान का अभिषेक करने के लिए एस्केलेटर लगवाया गया।

 

ऐसे भी है खास

 

यह मंदिर इतिहास की दृष्टि से भी खास है। समय का चक्र आगे बढ़ता गया, विकास का पहिया आगे बढ़ता गया। मंदिर का नाम नाम बदलता चला गया। बात हो रही है कोटा में दादाबाड़ी छोटा चौराहा के पास स्थित श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन त्रिकाल चौबीसी पुण्योदय तीर्थ क्षेत्र की। बताते हैं यहां प्राकृतिक स्थान, हरियाली होने के कारण इसे नसियांजी कहा जाता है। पूर्व में पहले मंदिर का नाम मूर्ति पाश्र्वनाथ के नाम से जाना जाता था। फिर पाश्र्वनाथ दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र नसियांजी कहा जाने लगा। फिर विकास की धारा में मंदिर वर्तमान नाम से जाना जाने लगा।

 

 

मंदिर कम से कम वर्ष प्राचीन है। यहां पहले बाड़ी थी और साधु संत तपध्यान साधना करते थे। मंदिर में मूलनायक भगवान आदिनाथ की प्रतिमा विराजमान थी। मंदिर समिति के पदाधिकारी मंदिर ३०० साल पुराना मानते हैं। ऐसा कहा जाता है कि झालरापाटन के विनोदीराम बालचंद ने मंदिर को बनवाया था।

 

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मंदिर समिति निदेशक हुकुम जेन काका और अध्यक्ष जम्मू कुमार जेन ने बताया कि यहां पूर्व में भगवान पार्शवनाथ की प्रतिमा विराजमान थी, जो चोरी चली गई थी, बाद में भगवान आदिनाथ की प्रतिमा को विराजमान किया गया। यह प्रतिमा काफी प्राचीन है। आदिनाथ ने बताया कि शहर का विस्तार हुआ और दादाबाड़ी बसी तो 1975-76 में मंदिर की देखरेख क्षेत्र के लोगोंं ने संभाली और नसियांजी क्षेत्रीय समाज समिति बनाई। तब एक हॉल में मंदिर था और आस पास चारदीवारी थी। मात्र एक वेदी पर भगवान आदिनाथ विराजमान थे। लोगों की बसावट के बाद मंदिर का विकास हुआ।

 

फिर हुआ चमत्कार

 

२००१ में मुनि सुधासागर का कोटा में चातुर्मास हुआ। उनकी प्रेरणा से मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया गया और यहां ७ वेदियों पर प्रतिमाओं को विराजमान किया गया। भगवान पाश्र्वनाथ आदिनाथ समेत अन्य प्रतिमाआें की स्थापना की गई। समाज के लोगों के अनुसार इस दौरान स्वत: भगवान के अभिषेक की यहां एक विशेष घटना हुई तो संत सुधासागर महाराज ने मंदिर का नाम पाश्र्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर अतिशय क्षेत्र दादाबाड़ी रखा गया। इसके बाद यहां कई साधु संतों के चातुर्मास हुए।

 

फिर देखों संत की महिमा

 

एक बार फिर मुनि पुुंगव सुधासागर के चरण २०१४ में कोटा की धरा पर पड़े और दादाबाड़ी नसियांजी में उनका चातुर्मास हुआ तो जैसे मंदिर का रूप ही बदल गया। संत की प्रेरणा से महज साढ़े चार माह में ४ मंजिला भव्य मंदिर बनाया गया। इसमें त्रिकाल चौबीसी व भगवान आदिनाथ की १५ फीट ऊंची प्रतिमा को विराजमान किया गया। इस मौके पर मंदिर में भगवान आदिनाथ की प्रतिमा पर १२१ किलो का रजत छत्र भी चढ़ाया गया।

 

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खास बात यह है कि इतने कम समय में तैयार 10.44 मीटर ऊंचा चार मंजिला मंदिर व 121 किलो का यह छत्र दोनों ही लिम्का बुक ऑफ द वर्क रिकार्ड में दर्ज हुए। इसके बाद तो जैसे यह क्षेत्र धार्मिक आस्था के साथ पर्यटन स्थल के रूप में भी देखा जाने लगा है। आदिनाथ बताते हैं कि श्रद्धालुओं की सुविधा से विशाल प्रतिमा पर अभिषेक करने के लिए एस्केलेटर लगाया गया है।

 

 

समाज के पदाधिकारियों की माने तो देश में इस तरह का यह पहला मंदिर है जहां अभिषेक करने के लिए एस्केलेटर का प्रयोग किया गया। हालांकि अब अन्य मंदिरों में भी लगने लगे हैं। मंदिर धार्मिक के साथ सामाजिक कार्योंं के लिए भी जाना जाता है। दूर दराज से कोटा में आकर कोचिंग करने वाले छात्रों के लिए यहां पर छात्रावास भी हैं।