
नागौर. मोहर्रम 17 जुलाई को मनाया जाएगा। इसको लेकर तैयारियां शुरू कर दी गई है। मोहर्रम पर जुलूस के साथ ताजिया निकाला जाएगा। मुहर्रम की 10वीं तारीख को यौम-ए-आशूरा के नाम से जाना जाता है। यह इस साल 17 जुलाई को होगा। दरअसल मुहर्रम इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना माना जाता है। हिजरी सन का आरंभ भी इसी महीने से होता है। इस महीने को इस्लाम के चार पवित्र महीनों में शुमार किया जाता है। अल्लाह के रसूल हजरत मुहम्मद (सल्ल.) ने इस महीने को अल्लाह का महीना कहा है। नागौर शहर में ड्योडी पीर की दरगाह, सिलावटों का मोहल्ला, न्यारो का मोहल्ला, बड़े पीर साहब की दरगाह, अजमेरी गेट, खान साहबों का मोहल्ला, पिंजरों का मोहल्ला, नकाश दरवाजा, लोहरपुरा, बाजारवाड़ा आदि से ताजियों का जुलूस पूरे लाव-लश्कर के साथ निकाला जाएगा।
बाहर से नहीं बुलाते कलाकार, खुद बनाते हंै ताजिया
ताजियों के जुलूस में ड्योडी पीर की दरगाह से भी ताजिया बरसों से निकाला जाता रहा है। इसकी विशेष बात यह है इस ताजिये को उस्मानिया सुलेमानिया परिवार ही बनाता रहा है। बाहर से या अन्य किसी कलाकार से इसे नहीं बनवाया जाता है। पीढ़ी दर पीढ़ी परिवार ही इस ताजिया को तैयार करने का काम करता रहा है। इस बार भी अपनी इस खानदानी विरासत को कायम रखते हुए गुलाम सबीर तैयार करने में लगे हुए हैं। हालांकि कई जगहों पर तो दूसरे कलाकार ताजिया तैयार करते हैं, लेकिन ड्योडी पीर की दरगाह का ताजिया विरासत के साथ ही कलात्मक प्रतिभा का शानदार नमूना है। इसे लकड़ी, एल्युमीनियम व कांच के साथ मिलाकर तैयार किया जा रहा है। बनने के बाद इसकी ऊंचाई पांच से छह फीट से ज्यादा ऊंचाई रहेगी, लेकिन इसकी ऊंचाई इतनी ज्यादा नहीं रखी जाएगी कि यह बिजली के तारों से कही अड़े। ड्योडी पीर दरगाह के सज्जादानशीन गुलाम सब्बर का कहना है कि इस ड्योडी का इतिहास तो सैंकड़ों बरस पुराना रहा है। अपने बरसो पुराने इतिहास के साथ ही ताजिया जुलूस निकाले जाने की परंपरा भी इसी ड्योडी के साथ चली आ रही है। इसे बनाने के लिए बाकायदा इस्लामिक पद्धति का ध्यान भी रखा गया है। यानि की इस ताजिया की हर मंजिल का निर्माण इबादत के साथ शुरू होता है।