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VIDEO…पशुपालक बोले: पशुओं को बीमारी से मरता या तड़पता नहीं देख सकते हैं, इसलिए बाहर से खरीद रहे दवाएं
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VIDEO…पशुपालक बोले: पशुओं को बीमारी से मरता या तड़पता नहीं देख सकते हैं, इसलिए बाहर से खरीद रहे दवाएं

नागौर. मौसमी बीमारियों का कहर पशुओं पर टूट रहा है, लेकिन स्थिति यह है कि जिले के पशु चिकित्सालयों में दवा ही इलाज के लिए उपलब्ध नहीं है। यह स्थिति पिछले करीब दस माह से बनी हुई है। अब अस्पताल आने वाले पशु पालकों को पशुओं के इलाज के लिए खुद ही बाहर से दवाएं खरीदकर लानी पड़ रही है। यह स्थिति तब है, जबकि मुख्यमंत्री नि:शुल्क दवा योजना के तहत न केवल 87 प्रकार की दवाओं की आपूर्ति इलाज क लिए सरकार की ओर से होती है, बल्कि नि:शुल्क इलाज करने का भी सरकार का निर्देश है। इसके बाद भी पशु पालकों को दवाएं अस्पतालों में नहीं मिल रही है।
रोजाना हजारों की लग रही पशु पालकों को चपत
जिले के लगभग दो सौ से ज्यादा पशु चिकित्सा केन्द्रों में चिकित्सक या कंपाउण्डर तो बैठ रहे हैं, लेकिन दवाएं नहीं हैं। इन केन्द्रों में रोजाना का आउटडोर लगभग एक हजार पशुओं का है। दवाएं नहीं होने के कारण इलाज के लिए पशुओं को लेकर आने वाले पालक बाहर मेडिकल स्टोर से एक बार में ही इन पालकों को लगभग एक हजार से 1500 रुपए तक की दवाएं बाजार से लानी पड़ रही है। बीमारी बढ़ी होती तो फिर दवा का खर्चा भी बढ़ जाता है। यह स्थिति नागौर शहर, ग्रामीण, मेड़ता, खींवसर, जायल, डेगाना, रियाबड़ी, परबतसर, डेगाना सहित अन्य क्षेत्रों में बनी हुई है।
इन दवाओं की है सख्त जरूरत, नहीं मिल रही
मौसमी बीमारियों में एनोरेक्सिया, वर्म इनफेक्शन, टिक व माइट इनफेक्श, पाइका, थनेला रोग, मिल्क फीवर, मैगट घाव, फड़किया से पीडि़त पशुओं का आंकड़ा बढ़ रहा है। इनके इलाज के लिए क्लोरामफेनिकोल, मलिएट एनाल्जिन, मलाक्सीसम पेरासिटामोल, सलफाडिमिडिन, बेलामिल, बेरेनिल, कैल्शियम मैग्नीशियम बोरो ग्लूकोनेट, क्लोमिन किट, डेक्सट्रोज, कैल्शियम फास्फोरस पाउडर, चारकोल, टरपेंटाइन ऑयल, पोवीडीन आयोडाइड, एल्बेंडाजोल, फेनबेंडाजोल आदि दवाओं की सख्त जरूररत हैं, लेकिन यही दवाएं अस्पताल में उपलब्ध ही नहीं है।
एक नजर इस पर भी
पॉली क्नीनिक-1
प्रथम श्रेणी पशु चिकित्सालय-18
पशु चिकित्सालय-59
पशु उपचिकित्सा केन्द्र-189
जिला पशु रोग निदान केन्द्र-1
जिला स्तरीय मोबाइल यूनिट-तीन

दवाएं व इंजेक्शन बाहर से लेकर आया
पॉली क्लीनिक में शुक्रवार को निकटवर्ती डुकोसी गांव आए रफीक की बीमार बकरी का इलाज कराने के लिए आए थे। यहां आए तो पता चला कि अस्पताल में दवा ही नहीं है। बकरी का इलाज कराना है तो बाहर से दवा लानी पड़ेगी। मजबूरी में रफीक को बाहर मेडिकल स्टोर से दवा लेकर आनी पड़ी। पशु पालक रफीक से बातचीत हुई तो बताया कि पहले से पता होता तो फिर निजी क्लीनिक में जाकर इलाज करा लेता। यहां इतनी दूर लाने के बाद पता चला कि इंजेक्शन आदि भी बाहर से ही खरीदकर लाने पड़ेंगे।
इस वजह से आपूर्ति में हुई देरी
विभागीय जानकारों के अनुसार पहले विधानसभा, और फिर लोकसभा चुनाव आचार संहिता के चलते दवाओं की आपूर्ति के लिए जयपुर में टेंडर प्रक्रिया नहीं हो पाई थी। अब चुनाव आचार संहिता को समाप्त हुए भी काफी समय हो गया। इसके बाद भी दवाएं नहीं पहुंची। अधिकारियों ने दबी जुबान से बताया कि विलंब का मूल कारण तो यही रहा है। अब हालांकि उम्मीद है कि दवाओं की आपूर्ति जल्द ही शुरू हो जाएगी।
इनका कहना है…
पशु अस्पतालों में दवाओं की आपूर्ति नहीं होने से मुश्किल की स्थिति जरूर है, लेकिन जल्द ही दवाओं की आपूर्ति हो शुरू हो जाएगी। हालांकि उच्चाधिकारियों को वस्तुस्थिति से अवगत करा दिया गया है। जल्द ही दवाओं का टोटा खत्म हो जाएगा।
डॉ. मोहनराम, उपनिदेशक, पशु पालन विभाग नागौर