नागौर. जिले के हरीमा में जन्मे भारतीय पार्श्व गायक सतीश देहरा ने नागौर के राज्य स्तरीय रामदेव पशु मेले के घटते दायरे को लेकर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि हमारी संस्कृति के परिचायक मेलों को जीवित रखने के लिए हमें सामूहिक प्रयास करने होंगे। मेले में सांस्कृतिक कार्यक्रम देने आए देहरा ने पत्रिका से विशेष बात की। पेश है बातचीत के प्रमुख अंश –
प्रश्न : नागौर का राज्य स्तरीय श्री रामदेव पशु मेले को जीवित रखने के लिए क्या-क्या कदम उठाए जाने चाहिए?
जवाब : मैंने जब मेला मैदान में सांस्कृतिक कार्यक्रम दिया तो महसूस किया कि मेले में बाहर के चेहरे कम देखने को मिले। मेले को लेकर सरकार व प्रशासन की ओर से जितने प्रयास करने चाहिए, वो देखने को नहीं मिल रहा है। हमें उनकी भागीदारी बढ़ानी होगी। सालों से चले आ रहे मेले को बढ़ावा देने के लिए सबसे जरूरी सबकी भागीदारी हो। जनता का रुझान मेले की तरफ कैसे हो, इस पर थोड़ा काम करने की आवश्यकता है। प्रचार-प्रसार पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। मेला शुरू होने से कम से कम एक महीने पहले प्रचार-प्रसार शुरू करना चाहिए। ताकि हमारी संस्कृति के परिचायक मेलों को जीवित रखा जा सके।
प्रश्न : नागौर की पहचान नागौरी नस्ल से है, आप क्या मानते हैं?
जवाब : मैं देशभर में घूमता हूं तो नागौरी बैलों की चर्चा सब करते हैं। नागौर के नागौरी बैल देशभर में प्रसिद्ध हैं, ऐसे में हमें चाहिए कि नागौरी नस्ल का संरक्षण हो, इसे बचाने के लिए हर व्यक्ति को प्रयास करने होंगे। इस बहाने गो सेवा भी की जा सकती है।
प्रश्न : पशु मेले में क्या नवाचार किए जाएं कि लोगों का जुड़ाव बना रहे?
जवाब : यह बात सही है कि खेती में अब बैलों का उपयोग पहले की तुलना में कम हो गया है, ऐसे में केवल पशुओं के बल पर मेले को जीवित नहीं रखा जा सकता। इसके लिए सरकार व प्रशासन को मेलों को व्यावसायिक रूप देना चाहिए, जिसमें बड़ा बाजार लगे। मेले को पर्यटन से जोडऩे के लिए स्तरीय कार्यक्रम आयोजित करवाएं। इसके साथ बाहरी राज्यों से जो व्यापारी पशु खरीदने आते हैं, उनको पर्याप्त सुविधाएं मिले। उन्हें आने-जाने में कोई परेशानी नहीं हो।
प्रश्न : पर्यटकों को मेले में लाने के लिए सरकार को क्या प्रयास करने चाहिए?
जवाब : पर्यटकों को मेला स्थल तक लाने के लिए सबसे पहले मेले का प्रचार-प्रसार करना होगा। इसके साथ उनके ठहरने व आसपास के पर्यटक स्थलों को भी मेले से जोडऩा होगा। माहौल बनाना होगा, माहौल बनेगा तो लोग अपने आप आएंगे।
प्रश्न : लोक कला और संस्कृति को कैसे जिंदा रखा जा सकता है?
जवाब : लोक कला व संस्कृति को जिवित रखने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका स्थानीय कलाकार निभाते हैं, इसलिए उन्हें प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है। इसके साथ जो बड़े कलाकार हैं, उन्हें भी ऐसे कार्यक्रमों से जोडऩा होगा, ताकि लोग भी कार्यक्रमों से जुड़े।
प्रश्न : नागौर से मुम्बई तक का सफर कैसे तय किया, इसके बारे में बताइए?
जवाब : संघर्ष तो खूब करना पड़ा। कई रुकावटें भी आईं, मेहनत भी बहुत करनी पड़ी, आज भी कर रहे हैं, क्योंकि किसी भी चीज को पाने के लिए लक्ष्य तय करना पड़ता है। मैंने लक्ष्य बनाया और उसकी तरफ बढ़े। कई लोगों के ताने भी सुनने पड़े, लेकिन जो किया, वो मन किया और आज बॉलीवुड में एक स्थान कायम किया है। कई लोगों के साथ काम किया है, कई फिल्में भी की है, एक फिल्म ‘मोटीसेठाणी’ 26 फरवरी को आ रही है।
प्रश्न : कला के क्षेत्र में भाग्य आजमा रहे युवाओं को क्या कहना चाहते हैं?
जवाब : सोशल मीडिया का जमाना है, कोई भी रातों-रात हिट हो सकता है, लेकिन सोशल मीडिया से हिट होकर लॉन्ग टाइम तक बने रहने के लिए मेहनत करनी पड़ेगी। उन्हें अच्छी मेहनत करनी होगी और धैर्य रखना होगा। सफलता अवश्य मिलेगी।