नागौर. जैन समाज के खतरगच्छ संघ के काली पोल स्थित कनक आराधना भवन में ें साध्वी मृगावती, सुप्रिया व नित्योदया, के सानिध्य में पर्युषण पर्व रविवार को धूमधाम से मनाया गया। इस मौके पर प्रवचन करते हुए साध्वी मृगावती ने कहा कि मिच्छामि दुक्कड़म कह कर क्षमा मांगनी चाहिए । यह पर्व त्याग व क्षमा की भावना सिखाता है। महान व्यक्ति ही क्षमा दे सकते है। किसी भी समस्या के समाधान में जहां तक सम्भव हो अहिंसा का सहारा ले, हिंसा का नहीं। क्षमा शब्द का अर्थ है जाने-अनजाने, मन-वचन व काया से किसी भी प्रकार की त्रुटि हुई हो तो उस के विषय में त्रिकरण योग से क्षमा मांगना ।क्षमा वहीं कर सकता है, जो शक्ति रहते हुए भी अंहकार के आवरण से मुक्त हो। जो व्यक्ति क्षमा दिवस पर भी क्षमा नहीं मांगता, वह व्यक्ति सच्चे भाव से जैन नहीं हो सकता । सच्चे दिल से खामेमि बोलने वाला व्यक्ति संसार में किसी भी प्राणी के साथ बैर भाव नहीं रख सकता। अहंकार का जहां विर्सजन होता है, वहीं क्षमा का सृजन होता है। जैन साधु एवं साध्वी श्रावक श्राविकाएँ प्रतिक्रमण में जिस क्षमा रखए का पाठ करते हैं वह है “खामेमि सव्वे जीवा सव्वे जीवा खमन्तु में, अर्थात मैं उन सब जीवों से क्षमा मांगता हूँ चाहे वह मेरे रिश्तेदार हो या गैर, भते ही वह मनुष्य हो अथवा पशु पक्षी । संसार के सभी जीव मेरे मित्र है। मेरा किसी से बैर भाव नहीं है। इसलिए सभी मुझे क्षमा करे। जगत में सभी से मैत्री भाव बनाये रखना एवं किसी से बैर की परम्परा नहीं बढ़ाना ही हमारा धर्म है !