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471 साल पुराने भीलवाड़ा के दूधाधारी गोपाल मंदिर में 48 साल से मटकी फोड़ लीला
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471 साल पुराने भीलवाड़ा के दूधाधारी गोपाल मंदिर में 48 साल से मटकी फोड़ लीला

भीलवाड़ा शहर के सांगानेरी गेट स्थित श्री दूधाधारी जी का गोपाल मंदिर का इतिहास 471 साल पुराना है। यहां कृष्ण जन्मोत्सव खास होता है।
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भीलवाड़ा। शहर के सांगानेरी गेट स्थित श्री दूधाधारी जी का गोपाल मंदिर का इतिहास 471 साल पुराना है। यहां कृष्ण जन्मोत्सव खास होता है। भीलवाड़ा का एकमात्र मंदिर है, जहां कृष्ण जन्मोत्सव के दूसरे दिन बधाई के साथ मलखम्भ का प्रदर्शन होता है। मंदिर के पास ही नया मंदिर निर्माणाधीन है। कृष्ण के रूप में पहले दुधाधारी गोपाल मंदिर में प्रतिदिन दर्शन करने वाले का तांता लगा रहता है। भक्तों की आस्था का मुख्य केंद्र है।

पुजारी पंडित कल्याण राय ने बताया कि भीलवाड़ा में पुरातन निंबार्क संप्रदाय के गोपाल मंदिर की स्थापना विक्रम संवत् 1609 में माघ शुक्ल बसंतपंचमी को निंबार्क संप्रदाय की परंपरानुसार लपरागोपालद्वारा आचार्य महंत सुंदरदास ने कराई थी। दूधाधारी गोपाल का भी वृंदावन के प्रेम मंदिर की तरह दो मंजिला मंदिर बना है

सांगानेरी गेट पर संवत 1609 करीब 471 साल पहले बसंत पंचमी को श्री दूधाधारी गोपाल मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण व राधारानी की प्राण-प्रतिष्ठा कराई गई। इस पौराणिक मंदिर के जीर्ण-शीर्ण होने पर वर्ष 2018 में भव्य मंदिर की कल्पना करते हुए गोलोकवासी महंत दीनबंधुशरण महाराज ने शिलान्यास कराया।

9 जनवरी 2019 को महंत के गोलोकवासी होने के बावजूद निर्माण कार्य जारी रहा और वृंदावन के प्रेम मंदिर की तर्ज पर बने इस मंदिर में 14 जून से 21 जून के बीच समारोह पूर्वक जगतगुरु निंबार्काचार्य श्यामशरण देवाचार्य महाराज के सानिध्य में ठाकुरजी को नूतन महल में विराजमान किया गया। मंदिर में पिछले 48 साल से जन्माष्टमी पर मटकी फोड़ व मल्लखंभ लीला हो रही है।

अधिकमास में सालभर के पर्व, उत्सव व त्योहार मनाए जाते हैं। सावन में झूला महोत्सव यहां की विशेषता है। यहां मंदिर को भव्य रूप देने का कार्य अभी जारी है। मंदिर में कान्हा राधा की बाल सुलभ की अलौकिक प्रतिमा है। यहां परिसर में शिवदरबार व बालाजी का मंदिर भी है।

निंबार्क संप्रदाय के मंदिर के प्रथम महंत सुंदरदास महाराज थे। दीनबंधुशरण महाराज 11वें महंत थे, जो वर्ष 1975 में गद्दी पर विराजित हुए। गोलोकवासी महंत दीनबंधुशरण से पहले भी यहां निंबार्क परंपरा के अनुसार आयोजन होते थे, लेकिन वर्ष 1975 के बाद करीब 48 साल पहले इसे विशाल रूप देकर अधिकमास में वर्षपर्यंत मनाए जाने वाले पर्व, उत्सव व त्योहार के साथ ही सावन में झूला महोत्सव मनाना शुरू किया। इसके तहत रोज नई झांकियां, झूले व फूल बंगले सजाए जाते हैं। जन्माष्टमी के दूसरे दिन नंद महोत्सव के साथ समापन होगा।