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फौजी पिता की तरह देश के लिए जंग लड़ता है बॉक्सिंग रिंग का शेर मनोज कुमार

भारतीय बॉक्सर मनोज कुमार ने अपने पिता के सपने को सच करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी।

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Kuldeep Panwar

Nov 03, 2017

नई दिल्ली। जिस फौजी ने एक बार नहीं बल्कि दो बार देश के लिए सीमा पर लड़ाई का मोर्चा संभालते हुए पाकिस्तान को नीचा दिखाया हो, उसका बेटा जंग में अव्वल रहे तो किसी को भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए। चाहे फिर जंग जिंदगी की हो या खेल के मैदान की। ये बात हो रही है दो बार के ओलंपियन और कॉमनवेल्थ गेम्स गोल्ड मेडल विजेता बॉक्सर मनोज कुमार की, जिसने बॉक्सिंग रिंग में अपने विपक्षियों से ठीक वैसे ही मोर्चा लिया है, जैसे जंग के मैदान में उनके पिता ने पाकिस्तानी फौज से। लेकिन मनोज ओलंपिक तक ऐसे ही नहीं पहुंचे बल्कि उन्हें कदम-कदम पर विपक्षी बॉक्सर सरीखी बन गई जिंदगी के ‘पंच’ भी जमकर खाने पड़े हैं।

 

Know Struggle of Indian Boxer Manoj Kumar Son of Indo Pak War Hero

फौजी पिता का सपना था ओलंपिक खेले बेटा
हरियाणा के कैथल जिले के गांव राजौंद निवासी शेर सिंह ने पाकिस्तान के खिलाफ 1965 और 1971 में दो बार भारतीय फौज की तरफ से लड़ाई में हिस्सेदारी की। शेर सिंह का सपना था कि उनके बेटे खेल के मैदान में देश की जंग लड़ें और ओलंपिक पदक जीतकर दिखाएं। मनोज बताते हैं कि पिता के इसी सपने ने उन्हें और उनके बड़े भाई राजेश कुमार को बॉक्सिंग रिंग में पहुंचा दिया।भाई खुद नहीं खेल पाए

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ओलंपिक तो मनोज को सिखाया हुनर
मनोज बताते हैं कि उनके बड़े भाई राजेश बहुत अच्छे बॉक्सर थे, लेकिन कुछ कारणों से वे ओलंपिक नहीं खेल पाए। इसके बाद राजेश ने पिता के सपने को पूरा करने के लिए मनोज को बॉक्सिंग सिखानी शुरू की, जो उस समय तक एथलेटिक्स में अपना भाग्य आजमा रहे थे।। भारतीय जूनियर बॉक्सिंग टीम के भी कोच रहे राजेश का सिखाया हुनर ही था कि मनोज इंटरनेशनल बॉक्सिंग में देश के लिए खेलने पहुंचे और लगातार खेल रहे हैं।

 

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30 किलोमीटर रोजाना ट्रेन से आना पड़ता था अभ्यास करने
मनोज बताते हैं कि उनका गांव कैथल से लगभग 30 किलोमीटर दूर है और खेल अभ्यास की सुविधाएं सिर्फ वहीं मौजूद थीं। ऐसे में वे, उनके बड़े भाई राजेश और दूसरे बड़े भाई मुकेश रोजाना सुबह जल्दी उठकर ट्रेन से अभ्यास करने के लिए कैथल जाते थे। वहां राजेश बॉक्सिंग की प्रैक्टिस करते थे तो मुकेश जूडो के खिलाड़ी थे। मनोज शुरुआत में एथलीट थे, लेकिन बाद में राजेश ने उन्हें भी बॉक्सिंग सिखानी शुरू कर दी।

 

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कॉमनवेल्थ गेम्स का गोल्ड जीता तो लगा कि ओलंपिक करीब है
दिल्ली में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स-2010 में मनोज कुमार ने देश के लिए गोल्ड मेडल जीतकर विशेषज्ञों को अपने ही राज्य के ओलंपिक कांस्य पदक विजेता बॉक्सर विजेंदर सिंह की झलक खुद में दिखाई। लेकिन बॉक्सिंग संघ की राजनीति में उन्हें एशियाड से वंचित कर दिया गया। हालांकि मनोज कहते हैं कि इसके बावजूद उन्हें अहसास हो गया था कि अब ओलंपिक बहुत करीब है। ऐसा ही हुआ और मनोज लंदन ओलंपिक-2012 में देश के लिए खेलने का गौरव हासिल कर गए। बता दें कि उस ओलंपिक में मनोज क्वार्टर फाइनल तक पहुंचे थे और उन्हें तथा विकास कृष्ण यादव को जिस तरह से हार मिली थी, उसे लेकर मैच के अंपायरों पर पूरे विश्व में सवाल उठे थे। इसके बाद मनोज ने पिछले साल रियो ओलंपिक में भी देश का प्रतिनिधित्व किया था।

 

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जिंदगी की जंग भी चलती रही है रिंग की जंग के साथ
मनोज कुमार के लिए रिंग से भी बड़ा संघर्ष बाहर जिंदगी में अपने लिए सम्मान पाने की जद्दोजहद रही। जहां एकतरफ दिल्ली कॉमनवेल्थ गेम्स में पदक भी नहीं जीतने वाले खिलाडिय़ों को अर्जुन अवॉर्ड से नवाजा जा रहा था, वहीं मनोज को पदक जीतने के बावजूद इससे वंचित रखा गया। यहां तक कि उनके कोच व बड़े भाई राजेश कुमार को भी द्रोणाचार्य अवॉर्ड नहीं दिया गया। नतीजतन इस सम्मान के लिए मनोज को कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा। अब एक लड़ाई उनकी खुद से भी कम उपलब्धियों वाले खिलाडिय़ों को हरियाणा पुलिस में डीएसपी पद दिए जाने के खिलाफ चल रही है। फिलहाल भारतीय रेलवे में कार्यरत मनोज हरियाणा सरकार की तरफ से दिया जा रहा इंस्पेक्टर पद का ऑफर ठुकराकर अपने लिए भी डीएसपी पद पाने की लड़ाई कोर्ट में लड़ रहे हैं।

 

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मिशन टोक्यो 2020 है अब एकमात्र सपना
मनोज बताते हैं कि मेरा एकमात्र सपना अब टोक्यो ओलंपिक-2020 में पदक जीतना है। देश के लिए दो ओलंपिक में खेलकर पिता की एक इच्छा तो वे पूरी कर चुके हैं, लेकिन मलाल है तो पदक नहीं जीत पाने का। वे कहते हैं कि मुझे ये कसक भी टोक्यो ओलंपिक में पदक जीतकर मिटानी है, जिसके लिए मैं रात-दिन एक किए हुए हूं।