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सिरोंज में औरंगजेब के समय से है पहाड़ी पर मौलाजी का स्थान

तुरत बीबी के स्थान पर प्रतिबंधित हैं पुरुष प्रवेश

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सिरोंज में औरंगजेब के समय से है पहाड़ी पर मौलाजी का स्थान

सिरोंज में औरंगजेब के समय से है पहाड़ी पर मौलाजी का स्थान

विदिशा. सिरोंज में एक पहाड़ी पर बनी गढ़ी जैसी शक्ल का एक प्राचीन भवन अब पुरातत्व के अधीन है। इसे मौलाजी की पहाड़ी के नाम से जाना जाता है। ऐसी मान्यता है कि औरंगजेब के समयं दो हाजियों ने ईराक में स्थित पैगम्बर हजरत मोहम्मद के स्थान से दो ईंटें लाकर इस पहाड़ी को गुलजार किया था। इसके बाद और निर्माण होते गए। यह भी कहा जाता है कि यहां मौला जी यानी पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब का पंजा निशान भी मौजूद है। यहां दो चबूतरे भी हैं, जिनमें से एक में नीम के वृक्ष का घेरा हैं। मान्यताओं के मुताबिक पास ही एक स्थान को तुरत बीबी के स्थान के रूप में जाना जाता है। एक ही पहाड़ी पर मौला जी और तुरत बीबी के स्थान हैं, लेकिन एक दीवार बीच में है। यहां हर वर्ग के सभी लोग आते-जाते हैं। लेकिन तुरत बीबी के स्थान पर पुरुषों का प्रवेश वर्जित है। यहां केवल महिलाएं ही पहुंचती हैं। पहाड़ी पर चढऩे के लिए पक्की और चौड़ी सीढिय़ां हैं, जहां से आसानी से मौलाजी की पहाड़ी पर पहुंचा जा सकता है। यहां प्रवेश द्वार अब भी पूरी शिद्दत से मजबूत और भव्यता के साथ खड़ा दिखाई देता है। अंदर काफी लंबा चौड़ा परिसर है। चौतरफा दहलान जैसे स्थान हैं, जिनके ऊपर छत है। यहां 2011-12 में तत्कालीन संस्कृति मंत्री द्वारा कराए गए जीर्णोद्धार की झलक दिखती है, प्रवेश द्वार पर मौला जी के स्मारक का पत्थर भी लगा हुआ है। स्मारक में अंदर अब भी बड़ा सा नगाड़ा रखा हुआ है, ऐसा प्रतीत होता है कि पहले कभी इसका उपयोग यहां जरूर होता होगा। अंदर एक परिसर के बाद दूसरा हिस्सा है जहां पेड़ का चबूतरा मौजूद है। इसके बाजू में अलग से दीवार के पीछे तुरत बीबी का स्थान बताया जाता है। इस स्थान पर बड़ी संख्या में हर धर्म की महिलाएं आस्था से पहुंचती हैँं। दरगाह पर मन्नतं के लिए लगाए जाने वाले गोबर के उल्टे और सीधे थापे यानी हाथ के निशान भी मौजूद हैं, यानी यहां लोग मन्नत के लिए भी पहुंचते हैं। यह शहर में ऐसा स्थान है जहां से सिरोंज की खूबसूरती को निहारा जा सकता है। यहीं से पंचकुइंयां और कैथन नदी दिखाई देती है और दूर पूरे शहर की बसाहट नजर आती है। प्रवेश द्वार के सरियों में से और छत पर से शहर को देखना सुकून देता है।

दो हाजी हजयात्रा से लाए थे ईंटें: डॉ शान फकरी
सिरोंज के वरिष्ठ उर्दृ साहित्यकार डॉ शान फखरी बताते हैं कि औरंगजेब के समय आदिल खां और रसूल खां हज करने गए थे और वे ईराक में पैगंबर साहब के स्थान से दो ईंटें लेकर आए थे, जिन्हें इस वीरान पहाड़ी पर स्थापित किया था, तभी से ये पहाड़ी मौलाजी की पहाड़ी के नाम से जानी जाने लगी। मौला अली कौन? डॉ फकरी कहते हैं कि पैगम्बर साहब को ही मौला अली कहा जाता है। ऐसा कहा जाता है कि यहां हजरत अली साहब का पंजा भी है, लेकिन ऐसा कुछ है नहीं। बरामदे हैं, मस्जिद भी यहां है। यहां हिन्दू मुस्लिम सभी धर्मों के लोग आते हैं। पहले यहां पहुंचना आसान नहीं था, लेकिन पूर्व मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा ने यहां सीढिय़ां बनवा दीं। अब यह पुरातत्व का स्मारक है।

तुरत बीबी के स्थान पर सिर्फ महिलाओं को अनुमति
विधायक उमाकांत शर्मा बताते हैं कि मौलाजी की पहाड़ी पर आषाढ़ के महीने में पहले मेला लगता था, जिसमें काफी लोग पहुंचते थे और चिरोंजी-बताशे का प्रसाद यहां चढय़ा जाता था। पास ही तुरत बीबी का स्थान है जहां सिर्फ महिलाओं को ही जाने की अनुमति है। यह स्थान सभी धर्मों के लिए माना जाता है। सभी धर्म के लोग यहां आते हैं।

मौलाजी का स्थान या सेंगरराज की गढ़ी
यकीनन पुरातत्व दस्तावेजों में यह स्थान मौलाजी की पहाड़ी के रूप में ही दर्ज है। प्रवेश द्वार पर इसका पत्थर भी लगा है, लेकिन मौला अली का यहां से सीधा कोई ताल्लुक नहीं मिलता। ये मजारें किसकी हैं, इस पर भी संशय है। लोगों का यह भी मानना है कि पहले सिरोंज में राजपूतों का राज था और इसे सेंगरराज कहा जाता था, जो धीरे-धीरे अपभ्रंश होकर सिरोंज हो गया। इन्हीं राजपूत राजाओं ने यहां पहाड़ी पर गढ़ी बनाई थी, जिसे औरंगजेब के समय मौला अली के स्थान के रूप में पहचान दी गई लेकिन इनमे्रं से कोई भी मान्यता विशुद्ध रूप से प्रमाणित नहीं लगती। लेकिन इतना तय है कि यह स्थान हिन्दू-मुसलमानों दोनों के लिए आस्था का स्थल जरूर है।