
विदिशा। गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा दुनियां भर में विख्यात है, 1लेकिन विदिशा में उदयगिरी पहाड़ी की परिक्रमा का भी उसी के जैसा महत्व है। अक्षय नवमी पर एक बार इस पहाड़ी की परिक्रमा से हजार परिक्रमाओं का पुण्य प्राप्त होता है। वैसे 127 वर्षों से उदयगिरी परिक्रमा यहां के धर्म, संस्कृति और इतिहास की त्रिवेणी मानी जाती है। गोवर्धन पर्वत भगवान कृष्ण और उनकी लीलाओं से जुड़ा हुआ है, जबकि उ उदयगिरी पहाड़ी भारत के सबसे बड़े नरवराह, मप्र की सबसे प्राचीन गणेश प्रतिमा, चौथी शताब्दी की महिषासुरमर्दिनी, मुखलिंगी शिव, शेषाशायी विष्णु, सूर्यदेव और नरसिंह प्रतिमाएं मौजूद हैं।
यह क्षेत्र इन देवी-देवताओं की महिमा के साथ ही बेतवा-बैस नदी के बीच संतों की तपोभूमि रही है। अक्षय नवमी की सुबह चौपड़ा स्थित रामलीला मेला समिति के प्रधानसंचालक निवास से यह परिक्रमा शुरू होती है।
1890 में हुई थी शुरूआत
प्रधान संचालक सहित प्रमुख पदाधिकारी यहां मंदिरों के निशानों की पूजा कर आरती उतारते हैं और फिर गाजे-बाजे से ये परिक्रमा शुरू होती है। चौपड़ा से यह परिक्रमा रामघाट और कालिदास बांध पार कर उदयगिरी क्षेत्र में पहुंचती है। नरसिंह शिला पर कवि सम्मेलन होता और फिर यहीं सब लोग भोज करते हैं। शाम तक ये 21 किमी का फेरा लगाकर सभी मंदिरों में पूजा कर ध्वज निशान चढ़ाकर रामलीला परिसर में आरती के बाद गणेश मंदिर पर समाप्त होती है। क्यों और कैसे हुई परिक्रमा की शुरुआत रामलीला मेला समिति के प्रथम प्रधान संचालक पं. विश्वनाथ शास्त्री ने 1890 में अपने चंद शिष्यों और शहर के कुछ लोगों के साथ उदयगिरी परिक्रमा की शुरुआत की थी।
संस्कृति से जोड़ती है परिक्रमा
इस परिक्रमा में प्राचीन बैसनगर और उदयगिरी का ही अधिकांश भाग शामिल है। शहर के कल्याण की कामना से यह परिक्रमा शुरू की गई थी, मंदिरो के ध्वजों को शामिल करके जहां इसे विशुद्ध धार्मिक रूप दिया गया। वहीं नृसिंह शिला पर कवि सम्मेलन के जरिए इसे साहित्य से जोड़ा गया। क्षेत्र की धरोहर के अवलोकन और लोगों को उससे अवगत कराने की यह परिक्रमा हमें संस्कृति से भी जोड़ती है। जबकि इस कार्य में सबकी भागीदारी बनाने का काम सामाजिक जुड़ाव को भी बनाए रखता है।
कण—कण में बसा है इतिहास
विदिशा के इस प्राचीन हिस्से के कण-कण में इतिहास बसा हुआ है। यह परिक्रमा इसे जानने का भी माध्यम है। इस तरह उदयगिरी परिक्रमा धर्म, संस्कृति, इतिहास, साहित्य और समाज को एक सूत्र में पिरोने का माध्यम है। अक्षय नवमी पर ही परिक्रमा क्यों अक्षय नवमी पर ही यह परिक्रमा क्यों की जाती है? इस संबंध में वर्षों से परिक्रमा से जुड़े सुरेश शर्मा शास्त्री कहते हैं कि आंवला नवमी को ही अक्षय नवमी कहते हैं, ऐसी मान्यता है कि इस दिन लिया गया ईश्वर का नाम, पूजा या दान हजार दान के बराबर होता है। ऐसे ही इस दिन की जाने वाली परिक्रमा का भी पुण्य भी हजार परिक्रमाओं के बराबर होता है। इसलिए यह दिन परिक्रमा के लिए चुना गया है।
Published on:
27 Oct 2017 04:01 pm
