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टाइट जींस व हाई हील्स से पैरों की नसों की तकलीफ, जानें इस रोग के बारे में

एक अनुमान के मुताबिक भारत की लगभग 7 से 9 प्रतिशत आबादी वैरीकोज वेंस से पीडि़त है। इससे पीड़ित महिलाओं की तादाद पुरुषों के मुकाबले चार गुना ज्यादा है।

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Vikas Gupta

Nov 30, 2017

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एक अनुमान के मुताबिक भारत की लगभग 7 से 9 प्रतिशत आबादी वैरीकोज वेंस से पीडि़त है। इससे पीड़ित महिलाओं की तादाद पुरुषों के मुकाबले चार गुना ज्यादा है।

वैरीकोज अल्सर क्या है?
पैरों की नसें मोटी होना वैरीकोज वेंस कहलाता है। यदि इसका समय रहते इलाज न किया जाए तो यह वैरीकोज अल्सर में बदल सकता है। एक अनुमान के मुताबिक भारत की लगभग 7 से 9 प्रतिशत आबादी वैरीकोज वेंस से पीडि़त है। इससे पीड़ित महिलाओं की तादाद पुरुषों के मुकाबले चार गुना ज्यादा है। तंग जींस व हाई हील पहनने से यह समस्या कम उम्र की युवतियों को भी होने लगी है।

वैरीकोज अल्सर के क्या कारण हैं?
पैरों की नसों में कई वॉल्व होते हैं जिनसे हृदय तक रक्तप्रवाह में मदद मिलती है। मोटापा, व्यायाम का अभाव, गर्भधारण के दौरान नसों पर असामान्य दबाव, लंबे समय तक खड़े रहना व अधिक देर तक टांग लटकाकर बैठने से कई बार ये वॉल्व क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। इससे उस स्थान पर रक्त जमा होने लगता है जिसे वैरीकोज वेंस की समस्या कहते हैं। गंभीर होकर यही अल्सर का रूप ले लेती है।

रोग के लक्षण क्या हैं?
ग्रसित स्थान पर सूजन व दर्द, थकान, बदरंग त्वचा, खुजली व नसों में सूजन जैसी समस्याएं होने लगती हैं।

इस बीमारी का इलाज क्या है?

इस रोग के इलाज में रेडियो फ्रिक्वेंसी एब्लेशन (आरएफए) प्रभावी पद्धति है। कलर-डोप्लर अल्ट्रासाउंड विजन के जरिए असामान्य नसों में एक रेडियोफ्रिक्वेंसी कैथेटर पिरोया जाता है और रक्तनलिका का इलाज रेडियो-एनर्जी से किया जाता है। इससे इसके साथ जुड़ी नसों पर प्रभाव पड़ता है। इंटरवेंशनल रेडियोलॉजिस्ट असामान्य नस में एक छोटा कैन्युला प्रवेश कराते हुए एड़ी के ठीक ऊपर या घुटने के नीचे असामान्य सैफेनस नस तक पहुंच बनाते हैं। एब्लेशन के लिए एक पतले और लचीले ट्यूब का इस्तेमाल किया जाता है जिसे कैथेटर कहा जाता है। कैथेटर की नोक पर इलेक्ट्रोड होता है जो मोटी नसों को ठीक करता है।
घरेलू उपाय (उपचार)

दिन में कम से कम एक बार अपने पैरों को ह्रदय से 20 इंच ऊँचाई तक उठाकर रखें।

चिकित्सीय दबाव वाले लम्बे मौजे (स्टॉकिंग) पहनें।

अपने पैर ठन्डे पानी के टब में डुबोकर रखें और पैदल चलने का अभ्यास करें।

स्नान के पश्चात प्रभावित नसों पर तेल लगाएँ और हलकी मालिश करें।

लम्बे समय तक खड़े और बैठे ना रहें।


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