
महिलाओं में रोग के लक्षण नहीं दिखते। मुख्य रूप से लक्षण फायब्रॉइड के आकार, संख्या या किस जगह (यूट्रस की दीवार, अंदर या बाहर) है पर निर्भर करते हैं।
गर्भाशय की मांसपेशियों में वृद्धि होकर गांठ का रूप ले लेना यूट्रस फायब्रॉइड की समस्या है। ज्यादातर मामलों में ये गांठें कैंसर की नहीं होती हैं। लेकिन कुछ मामले लक्षणों को लंबे समय तक नजरअंदाज करने के आते हैं जिनमें ये गांठें कैंसर का रूप ले लेती है। सोनोग्राफी से गांठ के आकार व जगह का पता चलता हैं।
महिलाओं में रोग के लक्षण नहीं दिखते। मुख्य रूप से लक्षण फायब्रॉइड के आकार, संख्या या किस जगह (यूट्रस की दीवार, अंदर या बाहर) है पर निर्भर करते हैं। जगह के अनुसार माहवारी अधिक या इस दौरान रक्त के ज्यादा थक्के निकलना जैसे समस्या होती है। खून की कमी से थकान व कमजोरी रहती है। यूरिन संबंधी परेशानी भी हो सकती है।
इन वजह से बनती गांठें
हार्मोन्स में गड़बड़ी इसकी मुख्य वजह है। विशेषकर अधिक वजन, अधिक उम्र, गर्भनिरोधक दवाएं लेने व गर्भवती महिलाओं में एस्ट्रोजन हार्मोन ज्यादा स्त्रावित होने से गांठ बनने लगती है। गंभीर स्थिति में किडनी में सूजन आ जाती है।
ऐसे होता इलाज
40 पार या जो महिलाएं बच्चा चाहती हैं उनमें इस गांठ को निकाल देते हैं। वहीं, अधिक उम्र में यूट्रस को पूरी तरह से बाहर निकालना एक विकल्प है। आयुर्वेद में लक्षणों के साथ गांठ के आकार को बढऩे से रोकने पर इलाज होता है। इसके लिए रोगी को जौ का दलिया, सत्तू व रोटी, शाली चावल घी संग खीर बनाकर, गुलाब की पंखुडिय़ां या धागामिश्री खाने को देते हैं। शोधन चिकित्सा में वमन, विरेचन कराते हैं। इमरजेंसी में जब महिला को सामान्य से अधिक ब्लीडिंग हो तो हेमामिलिस, कार्बोनेज दवा अन्य लक्षण, रोगी की स्थिति व गांठ की जगह देखकर देते हैं।
जटिलताएं
गर्भधारण के अलावा जिनकी फैलोपियन ट्यूब के नजदीक, ग्रीवा के मुंह पर यदि फायब्रॉइड हैं तो इंफर्टिलिटी का खतरा रहता है।
प्रेग्नेंसी के साथ यदि गांठें हों तो गर्भपात होने की आशंका रहती है।
गर्भावस्था के दौरान ये गांठें शिशु की नॉर्मल पोजिशन को बदल देती हैं।
लंबे समय तक नजरअंदाज करने पर तेज दर्द हो सकता है और महिला कोमा में जा सकती है।
कई बार गांठ कैंसर का रूप ले लेती है।
Published on:
10 Nov 2017 10:31 pm
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