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अपनी बेटियों पर विश्वास दिखाएं, उन्हें खुद अपने फैसले लेने दें

लोगों को अपने घर की बेटियों को वह आजादी देनी चाहिए कि वे खुद चुन सकें कि उन्हें जीवन से क्या चाहिए। हालांकि छोटे शहरों व कस्बों में भी अब बेटियों को पढ़ाई व कॅरियर के मौके देना परिवारों ने शुरू कर दिया है, लेकिन अभी और बदलाव लाने की जरूरत है।

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लोगों को अपने घर अपनी बेटियों पर विश्वास दिखाएं, उन्हें खुद अपने फैसले लेने देंकी बेटियों को वह आजादी देनी चाहिए कि वे खुद चुन सकें कि उन्हें जीवन से क्या चाहिए। हालांकि छोटे शहरों व कस्बों में भी अब बेटियों को पढ़ाई व कॅरियर के मौके देना परिवारों ने शुरू कर दिया है, लेकिन अभी और बदलाव लाने की जरूरत है।

अपनी बेटियों पर विश्वास दिखाएं, उन्हें खुद अपने फैसले लेने दें
कृतिका कामरा
संडे गेस्ट एडिटर
लोगों को अपने घर की बेटियों को वह आजादी देनी चाहिए कि वे खुद चुन सकें कि उन्हें जीवन से क्या चाहिए। हालांकि छोटे शहरों व कस्बों में भी अब बेटियों को पढ़ाई व कॅरियर के मौके देना परिवारों ने शुरू कर दिया है, लेकिन अभी और बदलाव लाने की जरूरत है। मैं भी मध्य प्रदेश के छोटे से शहर अशोकनगर से ताल्लुक रखती हूं, लेकिन मेरे परिवार ने मुझे न केवल अपना कॅरियर खुद चुनने की आजादी दी बल्कि मुझे आर्थिक स्वतंत्रता का महत्व भी समझाया। तभी कम उम्र में मैंने खुद कमाना और अपने खर्चे निकालना शुरू कर दिया था।

विरासत को आगे बढ़ा सकती हैं
महिलाएं खुद में सशक्त हैं। उन पर बस आपको विश्वास रखना होगा। बेटियां भी बेटों की तरह आपकी विरासत को आगे बढ़ा सकती हैं, चाहे वह व्यवसाय, सेना या अभिनय हो। आज कई ऐसे उदाहरण हैं जिसमें बेटियों ने अपने परिवार की विरासत को आगे बढ़ाया है। लगा जैसे मैं सभी से कट गई हूं मैं पढ़ाई में अच्छी थी, माता-पिता की इच्छा थी कि मैं डॉक्टर बनूं। मेडिकल की तैयारी के लिए कोटा गई लेकिन वहां जाकर मुझे महसूस हुआ कि मैं सभी से कट गई हूं। क्योंकि वहां का वातावरण ही ऐसा है कि सारा ध्यान केवल पढ़ाई पर रहा। जब हम पढ़ाई करते हैं तो लर्निंग से ज्यादा माक्र्स पर ज्यादा फोकस रहता है। मैं खुश नहीं थी। मैंने मेरे माता-पिता से इस बारे में बात की, उन्होंने मुझे समझा और सपोर्ट किया। मैं दिल्ली चली गई जहां फैशन इंस्टीट्यूट में पढाई की।

संघर्ष आपको मजबूत बनाते हैं
टीवी के लिए स्ट्रगल नहीं करना पड़ा। टीवी में जब काम किया तो कोई पहचान नहीं थी, धीरे-धीरे पहचान बनी और फिल्मों में एक नई पहचान बनाने की कोशिश कर रही हूं। धीरे-धीरे मैं इसमें कामयाब होते नजर आ रही हूं। संघर्ष हर क्षेत्र में होता है। मैं इसे एक निवेश के तौर पर देखती हूं।

आर्थिक स्वतंत्रता बेहद जरूरी
महिलाओं के लिए आर्थिक स्वतंत्रता बेहद जरूरी है। अपनी पहचान होना व खुद के पास पैसा होना बेहद जरूरी है। आप इससे किसी पर निर्भर नहीं रहते। वैसे भी महिलाओं का काम करना, एक तरह से पुरुषों से प्रेशर हटाता है। महिलाओं को अपने आप के लिए खड़े होना होगा। अपनी बात को धीरज से लेकिन बुलंद आवाज में रखें। याद रखें कि हमें मौका मिलते नहीं, बल्कि बनाने पड़ते हैं। महिलाओं को अपना आत्मविश्वास बनाकर रखना होगा।


बचपन में सीखी खेती-किसानी, अब पिता के खेतों को संभाल रहीं
ताबीर हुसैन
रायपुर. जिले के पांड़ाभाट गांव की मोना वर्मा 32 एकड़ की खेती संभाल रही है। वैसे तो उन्होंने बीएससी और हिंदी साहित्य में पीजी किया है लेकिन अब खेत-खलिहान में इतना रम गई हैं कि दूसरी कोई चीज भाती नहीं। मोना ने बताया, पिता के बुजुर्ग होने के बाद किसानी का काम बड़े भाई देख रहे थे। उनके असामयिक निधन के बाद यह जिम्मेदारी मुझ पर आई और मैं तीन वर्षों से खेतों की जुताई से लेकर मंडी में धान की बिक्री तक का काम देख रही हूं। मोना ने बताया, मैं गांव में पली बढ़ी। राजधानी रायपुर में कॉलेज किया। खेत में बचपन से आना जाना लगा रहा। इसलिए मेरे लिए किसानी का काम कोई नया नहीं था। पापा हमें खेत घुमाने ले जाते थे। इसी बहाने हम खेती का काम भी कर लेते थे। हमें पता ही नहीं चला कि हर चीज को सीखते चलते गए। ये सारी चीजें अनुभव की तरह मेरे काम आने लगीं।

नवाचार की जरूरत
किसानी में अब नवाचार की जरूरत है। कम लागत में ज्यादा से ज्यादा उत्पादन समय की मांग है। अब हमारे प्रदेश में भी किसान नई तकनीकों के साथ खेती किसानी कर रहे है। मैं भी तकनीकी तौर पर समय-समय पर कुछ नया करती रहती हूं। खेत में काम करने वाले लोग परिवार की तरह हैं। उनके साथ दोस्ताना व्यवहार से काम लेना भी एक ट्रिक है।

कड़ी मेहनत के साथ धैर्य जरूरी
कई बार लगता था कि यह काम बहुत थका देने वाला है। क्योंकि आपको खेतों में बहुत वक्त देना होता है। फसल में तरह-तरह की बीमारी का डर रहता है। कई बार कीटनाशक भी बेअसर साबित हो जाते हैं। कई बार तो मौसम भी चुनौती बन जाता है। किसानी में कड़ी मेहनत के साथ-साथ धैर्य का होना बहुत जरूरी है। परेशानियां तो आती ही रहेंगी।

'पिता के पदचिह्नों पर चल जीवन को मकसद मिला'
आलोक मिश्रा
बिलासपुर. किरण साहू किक बॉक्सिंग, वुशु, तलवारबाजी और कराटे जैसे खेलो की राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी हैं। 18 साल के खेल कॅरियर में अपनी परफोर्मेंस के दम पर कई राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं में पदक जीत चुकी हैं। किरण के कोच खुद उनके पिता रहे। मौजूदा समय में किरण अपने पिता के पदचिह्न पर चलते हुए उनकी इसी विरासत को संभाल रही हैं। किरण से प्रशिक्षित बच्चे अब तक दर्जनों प्रतियोगिता में मैडल जीत चुके हैं। जब वह 4 साल की थी तब उनके पिता उन्हें अपने पीठ पर गमछे से बांधकर दूसरे बच्चों को कराते की ट्रेनिंग दिया करते थे। तब से ही उनके मन में इस खेल के प्रति लगाव हो गया था। इसी लगाव ने उन्हें खेल से इतने लंबे समय तक बांध रखा, उन्हें कभी ऐसा एहसास नहीं हुआ कि इस खेल में बहुत अधिक मेहनत करनी पड़ती है।

उनके मन में बस एक ही बात की चिंता रहती थी कि क्या वह अपने पिता की उम्मीदों पर खरा उतर पाएंगी? किरण बताती है कि उन्हें कई बार आर्थिक तंगी के का भी सामना करना पडा जिसके चलते वह कुछ टूर्नामेंट में भाग नहीं ले पाईं। तब से उन्होंने इस बात की ठानी कि जब वह भविष्य में कुछ बनेगी तब वह बच्चों को इतनी कम दामों में ट्रेनिंग देगी कि गरीब से गरीब बच्चा भी इस खेल की ट्रेनिंग लेकर इस खेल में अपना कॅरियर बना सकें।