
बांग्लादेश चुनाव में डीपफेक अश्लील चित्रों से डर रहीं महिलाएं। ( प्रतीकात्मक फोटो: AI)
Gender-Based Violence: बांग्लादेश में 2026 के आम चुनाव (Bangladesh General Election 2026) का बिगुल बज चुका है, लेकिन इस बार की चुनावी जंग मैदानों से ज्यादा सोशल मीडिया के 'कुरुक्षेत्र' में लड़ी जा रही है। एक तरफ जहां राजनीतिक दल रैलियों में व्यस्त हैं, वहीं दूसरी तरफ महिला उम्मीदवारों के लिए यह चुनाव एक डरावना सपना साबित हो रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, बांग्लादेश में महिला प्रत्याशियों (Gender-Based Violence) को सुनियोजित तरीके से साइबर बुलिंग (Cyber Bullying), ऑनलाइन उत्पीड़न और डीपफेक (Deepfake) तकनीक के माध्यम से निशाना बनाया जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह हमले सामान्य आलोचना नहीं हैं, बल्कि यह "लिंग-आधारित हिंसा" (Gender-Based Violence) का डिजिटल रूप है। पुरुष उम्मीदवारों जहां उनकी नीतियों पर घेरा जाता है, वहीं महिला उम्मीदवारों के निजी जीवन, पहनावे और चरित्र पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
फेक फोटोज और वीडियो: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का दुरुपयोग करके महिला नेताओं के चेहरे अश्लील तस्वीरों या वीडियो पर लगाए जा रहे हैं।
अभद्र टिप्पणियां: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, विशेषकर फेसबुक और टिकटॉक पर, उनके खिलाफ गालियों और यौन हिंसा की धमकियों की बाढ़ आ गई है।
इसका मुख्य उद्देश्य इन महिलाओं को मानसिक रूप से तोड़ना और उन्हें चुनाव प्रचार छोड़ने पर मजबूर करना है। यह ट्रेंड न केवल उनकी सुरक्षा के लिए खतरा है, बल्कि एक लोकतांत्रिक देश में महिलाओं की भागीदारी को भी हतोत्साहित कर रहा है।
बांग्लादेश जैसे रूढ़िवादी समाज में, जहां परिवार की 'इज्जत' को महिलाओं से जोड़कर देखा जाता है, वहां इस तरह के साइबर हमले सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं। हमलावर जानते हैं कि अगर किसी महिला उम्मीदवार का चरित्र हनन किया जाएगा, तो उसका परिवार दबाव में आकर उसे चुनाव लड़ने से रोक देगा। मानवाधिकार संगठनों ने इसे लोकतंत्र के लिए "खतरे की घंटी" बताया है। कई मामलों में, विरोधी दलों के समर्थकों द्वारा 'ट्रोल आर्मी' का इस्तेमाल करके इन अभियानों को हवा दी जा रही है।
इतनी नफरत के बावजूद, कई महिला उम्मीदवार पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। वे साइबर सेल और चुनाव आयोग में शिकायतें दर्ज करा रही हैं। उनका कहना है कि यह "डिजिटल आतंकवाद" उन्हें जनता की सेवा करने से नहीं रोक सकता। हालांकि, पुलिस और प्रशासन की धीमी कार्रवाई ने उनकी चिंताओं को बढ़ा दिया है।
बांग्लादेश के प्रमुख महिला अधिकार समूहों ने इस स्थिति पर गहरा रोष व्यक्त किया है। उनका कहना है, "इंटरनेट को महिलाओं के खिलाफ हथियार बना दिया गया है। अगर चुनाव आयोग ने सोशल मीडिया कंपनियों पर लगाम नहीं लगाई, तो भविष्य में कोई भी महिला राजनीति में आने की हिम्मत नहीं करेगी।" वहीं, प्रभावित उम्मीदवारों ने मांग की है कि मेटा (फेसबुक) और टिकटॉक जैसी कंपनियों को चुनाव के दौरान विशेष निगरानी रखनी चाहिए और आपत्तिजनक सामग्री तुरंत हटानी चाहिए।
अब सबकी नजरें बांग्लादेश चुनाव आयोग (Election Commission) पर जमी हुई हैं।
सख्त कदम: क्या आयोग साइबर अपराधों के खिलाफ कोई विशेष हेल्पलाइन या टास्क फोर्स का गठन करेगा?
सोशल मीडिया पॉलिसी: क्या चुनाव प्रचार के दौरान फेक न्यूज और चरित्र हनन वाली पोस्ट्स को रोकने के लिए कोई सख्त गाइडलाइन जारी होगी?
कार्रवाई: जिन अकाउंट्स से धमकियां दी जा रही हैं, उन पर पुलिस कब तक कार्रवाई करती है, यह देखना अहम होगा।
यह घटनाक्रम एक बड़े वैश्विक खतरे की ओर इशारा करता है-चुनावों में 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' (AI) का गलत इस्तेमाल। बांग्लादेश का चुनाव यह दिखा रहा है कि कैसे डीपफेक वीडियो किसी की छवि को सेकंडों में बर्बाद कर सकते हैं। यह सिर्फ बांग्लादेश की समस्या नहीं है, बल्कि भारत सहित पूरी दुनिया के लिए एक चेतावनी है कि तकनीक का इस्तेमाल अगर बिना नियम-कायदे के हुआ, तो यह निष्पक्ष चुनाव की प्रक्रिया खत्म कर सकता है।
Published on:
08 Feb 2026 02:56 pm
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