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बांग्लादेश में गहराया रोहिंग्या संकट, फंडिंग घटी तो कैंपों की हालत बदतर

Bangladesh Rohingya Crisis: बांग्लादेश में रोहिंग्या संकट फिर छा गया है। बांग्लादेश के विदेश सचिव असद आलम सियाम ने बताया कि फंडिंग कम हो रही है। लेकिन हम ज्यादा फंडिंग के लिए और सपोर्ट जुटाने की कोशिश कर रहे हैं।
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भारत

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Saurabh Mall

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Updated: 25 Aug 2026, 11:42 AM IST

Rohingya crisis

रोहिंग्या संकट। फोटो में शरणार्थी (सोर्स: ani)

Bangladesh Rohingya Refugees: बांग्लादेश में रोहिंग्या संकट एक बार फिर गंभीर हालात पर पहुंच गया है। करीब दस लाख रोहिंग्या अब भी बांग्लादेश के कैंपों में रहने को मजबूर हैं। लेकिन मदद का पैसा लगातार कम हो रहा है। इसका सीधा असर कैंपों में रहने वाले लोगों की जिंदगी पर पड़ रहा है। राशन, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी बढ़ती जा रही है। हालात ऐसे हैं कि अगर जल्द मदद नहीं मिली, तो यह संकट और बड़ा हो सकता है।

फंडिंग में कमी से बढ़ी परेशानी

25 अगस्त 2017 को म्यांमार के रखाइन राज्य से बड़ी संख्या में रोहिंग्या बांग्लादेश पहुंचे थे। अब इस संकट को करीब नौ साल पूरे हो चुके हैं और दसवां साल शुरू हो गया है। इतने लंबे समय के बाद भी उनकी म्यांमार वापसी की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाई है।

बांग्लादेश के विदेश सचिव असद आलम सियाम ने कहा कि रोहिंग्या संकट के लिए मिलने वाली अंतरराष्ट्रीय फंडिंग कम हो रही है। उन्होंने बताया कि बांग्लादेश दूसरे देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों से ज्यादा मदद जुटाने की कोशिश कर रहा है।

सियाम के मुताबिक, बांग्लादेश इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय मंचों पर उठाता रहेगा। उनका कहना है कि म्यांमार पर डिप्लोमेटिक दबाव बनाए रखना जरूरी है। ताकि भविष्य में रोहिंग्याओं की सुरक्षित वापसी का रास्ता खुल सके।

दुनिया का ध्यान दूसरे संकटों पर

कॉक्स बाजार में रोहिंग्या कैंप लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय सहायता पर निर्भर हैं। ह्यूमन कंसर्न इंटरनेशनल भी यहां लंबे समय से काम कर रहा है। संगठन की सीईओ महमूदा खान के मुताबिक, पिछले एक साल में रोहिंग्या संकट को लेकर दुनिया का ध्यान कम हुआ है। कई दूसरे अंतरराष्ट्रीय संकट सामने आने के कारण रोहिंग्या मुद्दा पीछे छूट गया है। इसका असर फंडिंग पर भी पड़ा है। सरकारों और डोनर्स से पहले की तुलना में कम पैसा मिल रहा है। नतीजा यह है कि कैंपों की स्थिति लगातार खराब हो रही है।

राशन, शिक्षा और स्वास्थ्य की चिंता

कैंपों में रहने वाले रोहिंग्याओं के सामने रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने की चुनौती है। राशन पर्याप्त नहीं है। शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं भी सीमित हैं।

30 साल के रोहिंग्या हुसैन जोहर 2017 में कुटुपालोंग कैंप पहुंचे थे। उनका कहना है कि राशन बढ़ाने के साथ शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं पर भी ध्यान देना जरूरी है। एक्सपर्ट को डर है कि अगर इन जरूरतों को नजरअंदाज किया गया, तो इसका असर सिर्फ कैंपों तक सीमित नहीं रहेगा। इससे पूरे इलाके में अस्थिरता और सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियां बढ़ सकती हैं। महमूदा खान का कहना है कि इस संकट को खत्म करने का एक रास्ता लगातार जागरूकता बढ़ाना है। दुनिया को रोहिंग्याओं की स्थिति के बारे में बताते रहना होगा। ताकि यह संकट भुलाया न जाए और जरूरी मदद फिर से जुटाई जा सके।