
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग। (फोटो- IANS)
कैलिफोर्निया की एक अदालत ने फैसला सुनाया है कि स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी, चीन के पूर्व कम्युनिस्ट नेता माओ जेडोंग के करीबी सहयोगी रहे ली रुई की निजी डायरियां अपने पास रख सकती है। यह फैसला चीन की उस कोशिश को सीधी चुनौती है जिसमें वो इन दस्तावेजों को वापस लेना चाहता था।
ली रुई कभी माओ जेडोंग के खास सहयोगी हुआ करते थे। लेकिन वक्त के साथ वो चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के सबसे मुखर आलोचकों में से एक बन गए।
80 से भी ज्यादा साल तक उन्होंने चीन की सत्ता के भीतर की बातें, फैसले और घटनाएं अपनी डायरियों में लिखीं। ये डायरियां कोई आम लेखन नहीं हैं, बल्कि ये चीन के आधुनिक राजनीतिक इतिहास का एक ऐसा दस्तावेज हैं जो सरकारी कहानी से बिल्कुल अलग सच्चाई बयान करती हैं।
इनमें सबसे संवेदनशील हिस्सा है 1989 के तियानानमेन चौक नरसंहार का वो सीधा आंखों देखा हाल, जहां उन्होंने लिखा कि सेना ने आम नागरिकों पर गोलियां चलाईं। यह वो विषय है जिस पर चीन में आज भी कड़ी सेंसरशिप है।
Tibet Rights Collective की रिपोर्ट के मुताबिक यह मामला सिर्फ कागजों का नहीं, बल्कि नियंत्रण का है। ली रुई को डर था कि अगर ये डायरियां चीन की पहुंच में रहीं तो उन्हें या तो सेंसर कर दिया जाएगा, काट-छांट कर दिया जाएगा या फिर नष्ट कर दिया जाएगा।
यही वजह थी कि उन्होंने जानबूझकर इन दस्तावेजों को स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के हूवर इंस्टीट्यूशन को सौंपा ताकि दुनिया इन्हें पढ़ सके और सच्चाई बची रहे।
ली रुई खुद भी इस दमन के शिकार रहे थे। उनकी किताबें चीन में बैन हो चुकी थीं, उनकी आवाज को दबाया गया और उन्हें हाशिए पर धकेल दिया गया।
कैलिफोर्निया कोर्ट ने स्टैनफोर्ड के पक्ष में फैसला देकर यह साफ कर दिया कि सेंसरशिप की कोशिश किसी देश की सीमाओं के बाहर नहीं चल सकती।
इस फैसले से दुनियाभर के शोधकर्ताओं और इतिहासकारों की इन डायरियों तक पहुंच बनी रहेगी। Tibet Rights Collective ने इसे महज एक कानूनी जीत नहीं बल्कि तानाशाही सेंसरशिप और सच्चाई की हिफाजत के बीच की वैश्विक लड़ाई का एक निर्णायक मोड़ बताया है।
ली रुई की आखिरी इच्छा शायद यही थी, कि उनकी पूरी जिंदगी की लिखाई उस ताकत की पहुंच से दूर रहे जो इतिहास को अपनी सुविधा से लिखती है। कैलिफोर्निया की अदालत ने उनकी वो आखिरी इच्छा पूरी कर दी।
Published on:
05 Apr 2026 04:07 pm
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