
चीन सरकार। (फोटो- IANS)
चीनी सरकार आए दिन तुगलकी फरमान जारी कर रही है। ताजा रिपोर्ट के अनुसार, चीनी सरकार ने तिब्बतियों के धार्मिक जीवन पर प्रतिबंध और बढ़ा दिए हैं। नए आदेश के तहत 18 साल से कम उम्र के बच्चों के मठों में जाने पर रोक लगा दी गई है।
तिब्बत और निर्वासित तिब्बतियों को कवर करने वाले एक न्यूज पोर्टल 'फायुल' ने बताया कि ताजा प्रतिबंध की बात तब सामने आई जब मैसेजिंग प्लेटफॉर्म वीचैट पर एक वीडियो सामने आया, जिससे तिब्बती सांस्कृतिक और धार्मिक अधिकारों के उल्लंघन को लेकर चिंताएं बढ़ गईं।
रिपोर्ट में बताया गया है कि खाम में एक मठ के प्रवेश द्वार पर नोटिस लगाया गया है। जिसमें साफ लिखा है- 18 साल से कम उम्र के बच्चों को मठ में आने की अनुमति नहीं है।
नई नीति सर्दियों की छुट्टियों के दौरान लागू की गई, जब तिब्बती क्षेत्रों के स्कूल अपनी सालाना छुट्टियों के लिए बंद रहते हैं। इस दौरान, कई तिब्बती बच्चे अपने माता-पिता के साथ मठों में जाते थे। हालांकि, छुट्टियों के दौरान चीन के इस प्रतिबंध से बच्चे अपने परिवारों के साथ होने पर भी मठों में प्रवेश नहीं कर पाएंगे।
उधर, तिब्बत पर नजर रखने वाले एक शोधकर्ता 'सोनम टोबग्याल' ने कहा कि चीन का यह फैसला तिब्बती सांस्कृतिक विरासत को कमजोर करने के एक व्यवस्थित प्रयास का हिस्सा है।
फायुल ने उनके हवाले से कहा- हाल के वर्षों में तिब्बत में चीन ने बच्चों पर काफी सख्ती दिखाई है। तिब्बती बच्चों के लिए प्री-नर्सरी बोर्डिंग स्कूल को अनिवार्य किया गया है। इसके अलावा, छुट्टियों के दौरान मठों में तिब्बती भाषा की शिक्षा पर रोक लगाई गई है।
वहीं, अब सर्दियों की छुट्टियों के दौरान बच्चों के मठों में जाने पर प्रतिबंध घोषित किया गया है। यह बचपन के सबसे महत्वपूर्ण वर्षों के दौरान सांस्कृतिक पोषण से जानबूझकर वंचित करने की ओर इशारा करते हैं।
फायुल की रिपोर्ट के अनुसार, टोबग्याल ने कहा कि ये उपाय मिलकर एक औपनिवेशिक परियोजना बनाते हैं जिसका उद्देश्य युवा तिब्बतियों के रोजमर्रा के जीवन से तिब्बती सांस्कृतिक निशानों को मिटाना है।
तिब्बती बच्चों के लिए सरकारी स्कूलों में एक अतिरिक्त प्रशासनिक ढांचा बनाया गया है। जिसकी निगरानी चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) के यूनाइटेड फ्रंट वर्क डिपार्टमेंट द्वारा की जाती है।
यह एक ऐसी एजेंसी है, जिसका काम जातीय अल्पसंख्यकों और धार्मिक समूहों का प्रबंधन करना है। फायुल की एक रिपोर्ट के अनुसार, यह विभाग तिब्बती छात्रों की देखरेख करता है, उन्हें वैचारिक शिक्षा देता है और जबरन भाषाई व सांस्कृतिक आत्मसात करने की नीतियों को बढ़ावा देता है।
इस सिस्टम के माध्यम से तिब्बती बच्चों को अपनी मूल भाषा छोड़ने और चीनी भाषा, पहचान और राजनीतिक निष्ठा का समर्थन करने के लिए प्रोत्साहित या मजबूर किया जाता है।
आलोचकों ने कहा कि इन उपायों का उद्देश्य तिब्बती बच्चों को ऐसे व्यक्तियों में बदलना है जो चीनी भाषा बोलते हैं, सोचते हैं और खुद को चीनी के रूप में पहचानते हैं।
माता-पिता ने बताया है कि जब बच्चे सर्दियों और गर्मियों की छुट्टियों में घर पर होते हैं, तो वे एक-दूसरे से चीनी भाषा में बात करते हैं, सवालों के जवाब चीनी में देते हैं और मठों में जाने से डरते या हिचकिचाते हैं।
Updated on:
08 Feb 2026 06:07 pm
Published on:
08 Feb 2026 06:04 pm
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