
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप। (फोटो : ANI)
Donald Trump: डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन हिंद महासागर में एक अभूतपूर्व और चौंकाने वाले कदम पर विचार कर रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप मॉरीशस से रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण चागोस द्वीप समूह को सीधे खरीदने की योजना बना रहे हैं। इस गुप्त प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य ब्रिटेन को पूरी तरह बाईपास करना और हिंद महासागर में स्थित बेहद संवेदनशील 'डिएगो गार्सिया'सैन्य बेस पर पूर्ण अमेरिकी नियंत्रण हासिल करना है। व्हाइट हाउस की यह तैयारी ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर की उस योजना को बड़ा झटका दे सकती है, जिसके तहत ब्रिटेन इस द्वीप की संप्रभुता मॉरीशस को सौंपने जा रहा था। इस सनसनीखेज अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक खबर और व्हाइट हाउस के गुप्त नीति दस्तावेज का 'द टेलीग्राफ' व इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी विशेष रिपोर्ट में खुलासा किया है।
अमेरिकी अधिकारियों की ओर से तैयार किए गए इस आंतरिक नीति दस्तावेज में ब्रिटेन की उपेक्षा कर सीधे मॉरीशस के साथ सौदा करने का विकल्प रखा गया है। सूत्रों के अनुसार, यह विचार सबसे पहले अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के सामने आया था, जिन्होंने बाद में इसे राष्ट्रपति ट्रंप के समक्ष प्रस्तुत किया। हालांकि, फिलहाल यह योजना शुरुआती चरण में है और इसे प्राथमिक विकल्प नहीं माना जा रहा है, लेकिन ट्रंप प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी इस पर लगातार मंथन कर रहे हैं। अमेरिका को डर है कि यदि चागोस द्वीप समूह का नियंत्रण मॉरीशस को मिलता है, तो वहां चीन और ईरान का प्रभाव बढ़ सकता है, जिससे इस संवेदनशील अमेरिकी सैन्य अड्डे की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।
ट्रंप इस पूरी योजना को लेकर काफी समय से आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं। उन्होंने पूर्व में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर द्वारा चागोस द्वीप समूह की संप्रभुता मॉरीशस को सौंपने के फैसले की कड़ी आलोचना की थी। ट्रंप ने इसे ब्रिटिश सरकार की 'बड़ी मूर्खता' और 'कमजोरी का प्रतीक' बताया था। दरअसल, शुरुआती दौर में ट्रंप ने इस ट्रांसफर का समर्थन किया था, लेकिन युद्ध की शुरुआत में जब ब्रिटेन ने अमेरिका को डिएगो गार्सिया बेस से ईरान पर हवाई हमले करने की अनुमति देने में देर की, तो ट्रंप नाराज हो गए। इसके बाद से ही अमेरिका अपनी सुरक्षा के लिए वैकल्पिक रास्ते तलाश रहा है। डिएगो गार्सिया बेस से अमेरिका के बी-2 स्पिरिट स्टील्थ बॉम्बर आसानी से ईरान और एशिया के अन्य हिस्सों तक लंबी दूरी के मिशन को अंजाम दे सकते हैं।
अहम बात यह हे कि अगर अमेरिका इस खरीद योजना को आगे बढ़ाता है, तो प्रक्रिया काफी जटिल होगी। पहले अमेरिका को ब्रिटेन और मॉरीशस के बीच होने वाली संप्रभुता संधि को हरी झंडी देनी होगी, जिसके तहत ब्रिटेन सैन्य बेस को 99 साल के लिए पट्टे लीज पर लेने के एवज में मॉरीशस को लगभग 46.7 अरब डॉलर का भुगतान करेगा। इसके बाद अमेरिका मॉरीशस के सामने एक काउंटर-ऑफर रखकर सीधे द्वीप खरीदने की पेशकश कर सकता है। हालांकि, मॉरीशस ने सोमवार को एक आधिकारिक बयान जारी कर स्पष्ट कर दिया है कि उन्हें ट्रंप प्रशासन से अभी तक ऐसा कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रस्ताव नहीं मिला है। मॉरीशस ने यह भी दोहराया है कि चागोस द्वीप समूह पर उसकी संप्रभुता 'गैर-परक्राम्य' है और वह इस पर कोई समझौता नहीं करेगा।
इस खबर के सामने आने के बाद अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में खलबली मच गई है। मॉरीशस सरकार ने फौरन आधिकारिक प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि वह किसी भी कीमत पर अपनी संप्रभुता का सौदा नहीं करेगी। वहीं, ब्रिटेन की लेबर पार्टी और प्रधानमंत्री कीर स्टारमर के कार्यालय पर डोमेस्टिक प्रेशर बढ़ गया है, क्योंकि विपक्ष ट्रंप की इस कथित योजना को ब्रिटेन की वैश्विक साख और संप्रभुता के लिए एक बड़ा अपमान मान रहा है। रक्षा विश्लेषकों का कहना है कि अगर अमेरिका सीधे द्वीप खरीदने की दिशा में बढ़ता है, तो यह वैश्विक संधियों को दरकिनार करने का एक बड़ा उदाहरण बनेगा।
अहम बात यह है कि आने वाले दिनों में इस मामले में मॉरीशस और ब्रिटेन के बीच होने वाली द्विपक्षीय वार्ताओं पर सबकी नजर रहेगी। मॉरीशस ने पहले ही कहा है कि वह चागोस द्वीप समूह की वापसी के लिए ब्रिटेन को जुलाई के अंत तक का समय दे रहा है। यदि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप आधिकारिक तौर पर इस डील को ब्लॉक करते हैं या कोई बड़ा बयान देते हैं, तो ब्रिटेन के लिए इस द्वीप को मॉरीशस को सौंपना असंभव हो जाएगा क्योंकि ब्रिटेन खुद कह चुका है कि वह अमेरिकी सहमति के बिना आगे नहीं बढ़ेगा।
बहरहाल, इस पूरे विवाद का एक बड़ा मानवीय पहलू भी है। चागोस द्वीप समूह से दशकों पहले बेदखल किए गए शरणार्थियों का एक प्रतिनिधिमंडल हाल ही में ब्रिटेन पहुंचा है। उनका कहना है कि इस पूरे राजनीतिक पावर गेम में उनके अधिकारों और जन्मभूमि पर लौटने की मांग को दबा दिया गया है। शरणार्थी नेताओं का कहना है कि महाशक्तियां सिर्फ अपने सैन्य ठिकाने और भू-राजनीतिक हितों को देख रही हैं, जबकि सालों से पीड़ित मूल निवासियों के दर्द की किसी को परवाह नहीं है।
Published on:
08 Jun 2026 06:59 pm
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