
मोदी, यू मिन आंग ह्लाइंग और रबी लामिछाने । ( फोटो : AI)
Modi Diplomacy: भारत ने म्यांमार और नेपाल के शीर्ष नेताओं के दौरों के जरिए अपने पड़ोसियों के साथ फिर से रिश्ते मजबूत करने का स्पष्ट संदेश दिया है। पीएम नरेंद्र मोदी की मंशा है कि विदेश मंत्रालय का पूरा फोकस पड़ोसी राष्ट्रों पर हो, क्योंकि उनका मानना है कि उपमहाद्वीप में सशक्त संबंधों के अभाव में भारत एक वैश्विक ताकत नहीं बन सकता। सत्तारूढ़ राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष रबी लामिछाने ने 'हिंदुस्तान टाइम्स' के लिए लिखे गए एक विशेष लेख में हवाई, बुनियादी ढांचे और सीमा पार कनेक्टिविटी की जोरदार पैरवी की है। उन्होंने सीमा विवादों को तूल देने के बजाय भारत और नेपाल के मध्य सकारात्मक संबंधों पर जोर दिया है। गौरतलब है कि इन विवादों को चीन के समर्थक माने जाने वाले कम्युनिस्ट नेताओं केपी शर्मा ओली और प्रचंडने नेपाली राष्ट्रवाद की आड़ में जानबूझ कर हवा दी थी।
नेपाल की राजनीति में तेजी से उभरने वाले युवा और कद्दावर चेहरे, राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के अध्यक्ष रवि लामिछाने इन दिनों भारत के दौरे पर हैं। अपनी इस अहम यात्रा के दौरान उन्होंने नई दिल्ली स्थित भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय मुख्यालय का दौरा किया। यहां उनकी मुलाकात भाजपा के वरिष्ठ नेता नितिन नबीन से हुई। यह मुलाकात दोनों देशों के बीच 'पार्टी टू पार्टी' संबंधों को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है।
भारतीय उपमहाद्वीप में अमेरिका, चीन और ब्रिटेन सहित यूरोपीय देशों की भारत विरोधी गतिविधियों के मद्देनजर, नरेंद्र मोदी सरकार ने पश्चिम के चहेते पाकिस्तान को दरकिनार कर अन्य पड़ोसियों से जुड़ने का सटीक कदम उठाया है। म्यांमार के राष्ट्रपति यू मिन आंग ह्लाइंग का भव्य स्वागत करके भारत ने पश्चिमी देशों को अपने मजबूत इरादों से अवगत करा दिया है। इस कदम से मणिपुर, नगालैंड और अरुणाचल प्रदेश में सक्रिय भारत विरोधी उग्रवादी गुटों से पूर्वोत्तर की सुरक्षा भी सुनिश्चित हुई है।
वर्ष 2014 में सत्ता में आने के बाद से ही पीएम मोदी नेपाल के साथ घनिष्ठ संबंधों के पैरोकार रहे हैं और आर्थिक एकीकरण के जरिए इस हिमालयी देश का विकास सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं। पीएम मोदी का स्पष्ट निर्देश है कि विदेश मंत्रालय का मुख्य ध्येय पड़ोसी देश होने चाहिए, क्योंकि उपमहाद्वीप में बेहतरीन तालमेल के बिना भारत को विश्व शक्ति का दर्जा नहीं मिल सकता। वहीं, अमेरिका समर्थित तथाकथित ट्रैक-2 कूटनीति के बावजूद मोदी सरकार ने दोटूक कहा है कि जब तक पाकिस्तानी सेना (रावलपिंडी) सीमा पार आतंकवाद बंद नहीं करती, तब तक पाकिस्तान से कोई बातचीत नहीं होगी।
चीन के प्रति भी भारत का रवैया बहुत सख्त है; नई दिल्ली का साफ कहना है कि कोई भी द्विपक्षीय समझौता 3488 किलोमीटर लंबी एलएसी (LAC) पर शांति और स्थिरता के आधार पर ही होगा। इसी महीने बीजिंग में पाकिस्तानी पीएम शहबाज शरीफ के दौरे पर जारी संयुक्त बयान में कश्मीर मुद्दे का जिक्र इस बात का प्रमाण है कि भारत को दोहरे मोर्चे पर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि कम्युनिस्ट चीन पाकिस्तान को कम-से-कम एक मध्यम-शक्ति के रूप में स्थापित करने की फिराक में है।
मौजूदा हालात में भारत के लिए श्रीलंका और भूटान के साथ प्रगाढ़ संबंध बनाए रखना नितांत आवश्यक है। साथ ही, मालदीव को आर्थिक मदद जारी रखना भी जरूरी है, भले ही वहां के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू ने भारत विरोधी भावनाओं को भुनाकर चुनाव जीता हो। भारत भली-भांति जानता है कि नेपाल और बांग्लादेश जैसे देश दोनों एशियाई शक्तियों के बीच संतुलन बनाकर चलते हैं, लेकिन भारत उपमहाद्वीप में अपनी बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के एवज में कोई अनुचित लाभ या भारी ब्याज नहीं वसूलता है।
उपमहाद्वीप में अपना प्रभाव चीन के हाथों में सौंपने के बजाय, नई दिल्ली को म्यांमार, भूटान और नेपाल जैसे पड़ोसियों के साथ खुद आगे बढ़कर रिश्ते मजबूत करने चाहिए। इसके लिए ऐसे राजनयिकों की नियुक्ति की जानी चाहिए जो द्विपक्षीय संबंधों को नई दिशा देने में संकोच न करें। बांग्लादेश में शेख हसीना के सत्ता से बाहर होने की घटना ने भारत को यह सिखाया है कि अमेरिका और पश्चिमी ताकतें एक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में भारत को कमजोर करने के लिए कितनी तेजी से समीकरण बदल रही हैं। इससे न केवल पड़ोसियों को बल्कि बड़ी शक्तियों को भी फायदा होता है, क्योंकि वे सभी भारत के उदय को चुनौती देना चाहते हैं।
दरअसल, पीएम मोदी भारतीय उपमहाद्वीप में "चाय कूटनीति" के समर्थक रहे हैं, जहां नेता औपचारिक कूटनीतिक प्रक्रियाओं में उलझने के बजाय जब चाहें तब एक-दूसरे से मिल सकते हैं। रबी लामिछाने और म्यांमार के सीनियर जनरल ह्लाइंग के दौरे इस बात के सुबूत हैं कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते हुए पड़ोसियों के साथ जुड़ने को तैयार है। बहरहाल, मोदी सरकार का पूरा फोकस अब अपने भरोसेमंद पड़ोसियों पर है और वह उन देशों पर अपना समय बर्बाद नहीं कर रही है जो उपमहाद्वीप में अपना दबदबा बनाने के लिए पाकिस्तान को मोहरा बनाते हैं।
Published on:
02 Jun 2026 02:30 pm
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