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ब्रिटेन द्वारा भारत पर किए गए शासन के दौर को शायद ही कोई भूल सकता है। ब्रिटेन ने लंबे समय तक भारत पर शासन किया। एक समय पर भारत को 'सोने की चिड़िया' कहा जाता था, क्योंकि भारत काफी संपन्न देश था। पर ब्रिटेन के शासन के बाद भारत 'सोने की चिड़िया' नहीं रहा। इसकी वजह है ब्रिटेन का भारत में लूटपाट मचाना। ब्रिटेन ने जिस दौरान भारत पर शासन किया, उस दौरान भारत से काफी संपत्ति लूटी गई। इतना ही नहीं, जब ब्रिटेन ने भारत छोड़ा, तब भी भारत से काफी संपत्ति लूटी।
ब्रिटिश शासन के दौरान भारत से करीब 64.82 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर्स की संपत्ति लूटी गई। इसमें से 33.8 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर्स की संपत्ति यानी कि करीब आधा हिस्सा ब्रिटेन के सबसे अमीर 10% लोगों की जेब में गया। यह राशि इतनी थी कि 50 ब्रिटिश पाउंड के नोटों के रूप में लंदन की सडक़ों पर चार परत बिछाई जा सकती थीं। यह खुलासा ऑक्सफैम इंटरनेशनल की वैश्विक असमानता रिपोर्ट में हुआ है। इसे दावोस में विश्व आर्थिक मंच की सालाना बैठक के पहले दिन सोमवार को जारी किया गया।
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‘टेकर्स, नॉट मेकर्स’ शीर्षक वाली रिपोर्ट में कई अध्ययनों और शोध पत्रों का हवाला देते हुए कहा गया कि आधुनिक ब्रिटिश बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भारत से लूटी गई संपत्ति की देन हैं। उपनिवेशवाद के समय व्याप्त असमानता और लूट की विकृतियाँ आधुनिक जीवन को आकार दे रही हैं। रिपोर्ट के मुताबिक ब्रिटेन में आज सबसे अमीर लोगों की बड़ी संख्या अपने परिवार की संपत्ति का श्रेय गुलामी और उपनिवेशवाद को देती है। ईस्ट इंडिया जैसी कंपनियों ने इसकी शुरुआत की थी, जो कई औपनिवेशिक अपराधों के लिए जिम्मेदार थीं। भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में 2.60 लाख सैनिक थे। यह संख्या ब्रिटिश शांतिकालीन सेना से दुगुनी थी।
रिपोर्ट में कहा गया कि भारतीय उपमहाद्वीप का 1750 में वैश्विक औद्योगिक उत्पादन में करीब 25% हिस्सा था। यह आंकड़ा 1900 तक तेजी से घटकर सिर्फ 2% रह गया। इस नाटकीय गिरावट के लिए एशियाई वस्त्रों के खिलाफ ब्रिटेन की सख्त संरक्षणवादी नीतियाँ जिम्मेदार थीं। इन नीतियों ने भारत की औद्योगिक विकास क्षमता को कमजोर कर दिया था।
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ऑक्सफैम का कहना है कि उपनिवेशवाद ने बेहद असमान दुनिया बनाई। ऐसी दुनिया जो नस्लवाद के आधार पर विभाजित है। ऐसी दुनिया जो दक्षिण के देशों से व्यवस्थित रूप से धन निकालना जारी रखती है, ताकि उत्तर के देशों के सबसे अमीर लोगों को लाभ पहुंचाया जा सके। रिपोर्ट के मुताबिक बहुराष्ट्रीय कपंनियाँ अक्सर एकाधिकार की हालत में होती हैं। वो विश्व के दक्षिणी हिस्से में श्रमिकों, विशेष रूप से महिला श्रमिकों का शोषण जारी रखती हैं। श्रमिकों को प्रतिकूस कामकाजी हालात, सामूहिक सौदेबाजी के अधिकारों की कमी और न्यूनतम सामाजिक सुरक्षा का सामना करना पड़ता है।
Updated on:
21 Jan 2025 11:06 am
Published on:
21 Jan 2025 11:05 am
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