
Shehbaz Sharif And Asim Munir
Iran-Israel War: साल 2026 की शुरुआत में पाकिस्तान एक अजीब स्थिति में था। देश के पास गैस ज्यादा थी, लेकिन उसे इस्तेमाल करने वाले कम होते जा रहे थे। पिछले कुछ सालों में LNG (लिक्विफाइड नेचुरल गैस) की मांग लगातार गिर रही थी। 2021 में जहां खपत 8.2 मिलियन टन थी, वहीं 2025 के आखिर तक यह घटकर करीब 6.1 मिलियन टन रह गई। इस गिरावट के पीछे दो बड़ी वजहें थीं। पहली, सौर ऊर्जा का तेजी से बढ़ता इस्तेमाल। लोग और उद्योग अब सस्ती और साफ ऊर्जा की ओर बढ़ रहे थे। दूसरी, औद्योगिक गतिविधियों में कमी, जिससे गैस की जरूरत कम हो गई।
हालात ऐसे हो गए थे कि सरकार को अतिरिक्त LNG से निपटने के लिए कई कदम उठाने पड़े। कुछ गैस के कार्गो विदेशों में बेच दिए गए, तो कुछ घरेलू गैस कुओं को बंद करना पड़ा ताकि पाइपलाइन में दबाव न बढ़े। इतना ही नहीं, बची हुई गैस को घरों तक सस्ती दरों पर पहुंचाया गया, जिससे सरकार को नुकसान हुआ और ऊर्जा क्षेत्र का कर्ज और बढ़ गया। लेकिन ये कहानी यहीं तक सीमित नहीं रही। फरवरी के आखिर में वेस्ट एशिया में अचानक हालात बदल गए। 28 फरवरी को अमेरिका और इज़राइल ने ईरान के खिलाफ बड़ा सैन्य अभियान शुरू किया। इसके जवाब में ईरान ने भी मिसाइल और ड्रोन हमले किए। देखते ही देखते पूरा इलाका तनाव में आ गया।
इस संघर्ष का सबसे बड़ा असर पड़ा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर, जो दुनिया के तेल और गैस के लिए एक अहम रास्ता है। यहां से गुजरने वाला ट्रैफिक लगभग ठप हो गया। इसका असर सीधे ग्लोबल ऊर्जा सप्लाई पर पड़ा। 2 मार्च को ईरानी ड्रोन हमलों ने कतर के रास लाफान इंडस्ट्रियल सिटी को निशाना बनाया। यह दुनिया का सबसे बड़ा LNG निर्यात केंद्र माना जाता है। हमले के बाद कतर को अपना उत्पादन रोकना पड़ा। हालात इतने गंभीर थे कि कतर एनर्जी ने “फोर्स मेज्योर” घोषित कर दिया, यानी वह अपनी सप्लाई की जिम्मेदारी निभाने की स्थिति में नहीं था।
इसके बाद 18 मार्च को इजराइल ने ईरान के साउथ पार्स गैस फील्ड पर हमला किया। यह वही क्षेत्र है जो कतर के नॉर्थ फील्ड से जुड़ा हुआ है। इस घटना ने डर और बढ़ा दिया कि गैस उत्पादन लंबे समय तक प्रभावित रह सकता है। लगातार हमलों और नुकसान के चलते कतर को LNG उत्पादन में करीब 17% कटौती करनी पड़ी। विशेषज्ञों का मानना है कि इस नुकसान की भरपाई में सालों लग सकते हैं।
जो पाकिस्तान कुछ हफ्ते पहले तक गैस की अधिकता से जूझ रहा था, वही अब अचानक कमी का सामना करने लगा। ग्लोबल सप्लाई घट गई, कीमतें बढ़ गईं और आयात मुश्किल हो गया। यानी हालात पूरी तरह पलट गए। यह घटना एक बड़ा सबक भी देती है। ऊर्जा का मामला सिर्फ मांग और आपूर्ति तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह पूरी तरह भू-राजनीतिक हालात पर भी निर्भर करता है। एक जंग, एक हमला और पूरी दुनिया की ऊर्जा व्यवस्था हिल सकती है।
Published on:
04 Apr 2026 08:54 pm
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