
ईरान के मुजतबा खामेनेई और सऊदी अरब के मोहम्मद बिन सलमान के बीच पाकिस्तान के शहबाज शरीफ
Defense Pact: अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच भड़के विनाशकारी युद्ध (Iran Israel War) ने मिडिल ईस्ट को एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध की आग में झोंक दिया है। हाल ही में इजराइल और अमेरिका के हवाई हमलों (US Iran Conflict) में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई। इसके बाद प्रतिशोध की आग में उबल रहे तेहरान ने खाड़ी देशों, विशेषकर सऊदी अरब में स्थित अमेरिकी सैन्य और तेल ठिकानों पर ताबड़तोड़ बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन हमले शुरू कर दिए हैं। इस तेजी से बदलते घटनाक्रम ने पाकिस्तान को एक बहुत मुश्किल कूटनीतिक और रणनीतिक चौराहे (Pakistan Saudi Arabia) पर लाकर खड़ा कर दिया है। सऊदी अरब के साथ हुए रक्षा समझौते और ईरान से सटी सीमा के कारण पाकिस्तान एक बड़े कूटनीतिक धर्मसंकट में फंसा हुआ है। अब इस्लामाबाद के सामने यह सबसे बड़ा सवाल है कि वह इस युद्ध में किस पक्ष का साथ दे।
पाकिस्तान की यह दुविधा मुख्य रूप से सितंबर 2025 में सऊदी अरब के साथ हुए 'संयुक्त रणनीतिक रक्षा समझौते' (Defense Pact) की वजह से पैदा हुई है। नाटो के नियमों की तर्ज पर हुए इस अहम समझौते में यह साफ लिखा है कि दोनों में से किसी भी देश पर हुआ सैन्य हमला दोनों देशों पर हमला माना जाएगा। ईरान की ओर से सऊदी अरब की रिफाइनरियों और एयरबेस पर हमलों के बाद, सऊदी के रक्षा मंत्री खालिद बिन सलमान ने पाकिस्तानी सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को तत्काल रियाद बुलाया। सऊदी अरब ने स्पष्ट रूप से इस रक्षा समझौते को लागू करने की बात कही है, जिसने पाकिस्तान की नींद उड़ा दी है।
इस्लामाबाद के लिए ईरान के खिलाफ सीधे सैन्य मोर्चा खोलना आत्मघाती कदम साबित हो सकता है। पाकिस्तान और ईरान एक-दूसरे के साथ लगभग 900 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करते हैं। यह सरहद अशांत बलूचिस्तान प्रांत से लगती है, जहां पहले से ही सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा है। अगर पाकिस्तान युद्ध में कूदता है, तो ईरान सीमा पार से पाकिस्तान के अंदरूनी इलाकों में भारी तबाही मचा सकता है।
इसके अलावा एक बड़ा घरेलू संकट भी है। देश की बड़ी आबादी शिया मुसलमानों की है। खामेनेई की मौत के बाद से ही पूरे पाकिस्तान में शिया समुदाय सड़कों पर उग्र प्रदर्शन कर रहा है। सरकार को डर है कि युद्ध में सऊदी अरब का साथ देने से देश में सांप्रदायिक दंगे और गृहयुद्ध भड़क सकता है।
इन तमाम खतरों के बावजूद, पाकिस्तान सऊदी अरब को 'ना' कहने की स्थिति में भी नहीं है। आर्थिक तंगी से जूझ रहे पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से सऊदी अरब के अरबों डॉलर के कर्ज, बेलआउट पैकेज और सस्ते तेल पर टिकी हुई है। इसके अतिरिक्त, पाकिस्तान ने हाल ही में अमेरिकी प्रशासन के साथ अपने संबंधों को फिर से मजबूत करने के लिए बहुत मेहनत की है।
ऐसे में सऊदी-अमेरिकी गठबंधन को नाराज करने का मतलब है अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारना। अगर पाकिस्तान अपने रक्षा समझौते से मुकरता है, तो सऊदी अरब हमेशा के लिए अपनी आर्थिक मदद बंद कर सकता है, जिससे पाकिस्तान पूरी तरह दिवालिया हो जाएगा।
इन हालात को संभालने के लिए पाकिस्तान कूटनीतिक बातचीत का सहारा ले रहा है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हाल ही में सऊदी अरब का दौरा किया और सऊदी नेतृत्व को अपने "पूर्ण समर्थन" करने का वादा किया।
रणनीतिकारों का मानना है कि पाकिस्तान सीधे तौर पर अपने लड़ाकू विमान या सैनिक ईरान पर हमले के लिए नहीं भेजेगा। इसके बजाय, वह सऊदी अरब को एयर डिफेंस सिस्टम (हवाई सुरक्षा), रडार सपोर्ट और खुफिया जानकारी देने तक खुद को सीमित रख सकता है। पाकिस्तान इस समय एक पतली रस्सी पर चल रहा है; एक छोटी सी कूटनीतिक चूक उसे इस भीषण जंग की लपटों में हमेशा के लिए झुलसा सकती है।
रक्षा और भू-राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान सीधे तौर पर सैन्य आक्रामकता दिखाने से बचेगा। वह सऊदी अरब को केवल एयर डिफेंस और खुफिया मदद (इंटेलिजेंस सपोर्ट) देकर रक्षा समझौते की लाज बचाने की कोशिश करेगा, ताकि ईरान से सीधे दुश्मनी मोल लेने से बचा जा सके।
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर के सऊदी अरब दौरे के बाद, अब पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या पाकिस्तानी संसद अपनी सेना को आधिकारिक रूप से सऊदी अरब की रक्षा के लिए खाड़ी क्षेत्र में तैनात करने की मंजूरी देती है या नहीं।
बहरहाल, पाकिस्तान के अंदरूनी हालात बहुत तनावपूर्ण हैं। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद पाकिस्तानी शिया समुदाय में भारी रोष है। देश के कई हिस्सों में हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं, जिसके कारण पाकिस्तानी सेना को अपनी ही जनता के खिलाफ कर्फ्यू और सख्त कदम उठाने पड़ रहे हैं।
Updated on:
13 Mar 2026 08:40 pm
Published on:
13 Mar 2026 08:37 pm
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