
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग। (फोटो- IANS)
Global Diplomacy : दुनिया भर में जारी भू-राजनीतिक तनाव और संघर्षों के बीच ईरान ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण रणनीतिक कदम उठाया है। ईरान सरकार ने आधिकारिक तौर पर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की ओर से पेश किए गए 'चार-सूत्रीय शांति प्रस्ताव' का समर्थन करने की घोषणा की है। यह प्रस्ताव मुख्य रूप से युद्धविराम और विवादों के कूटनीतिक समाधान पर केंद्रित है। ईरान के इस फैसले को वैश्विक राजनीति में चीन के बढ़ते प्रभाव और पश्चिम के प्रभुत्व को चुनौती देने के रूप में देखा जा रहा है।
चीनी राष्ट्रपति की ओर से प्रस्तावित इस शांति योजना में चार मुख्य स्तंभों पर जोर दिया गया है, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय स्थिरता के लिए अनिवार्य माना गया है। संप्रभुता का सम्मान, यानि सभी देशों की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता का सम्मान करना। संयुक्त राष्ट्र चार्टर का पालन करना और किसी भी विवाद के समाधान के लिए अंतरराष्ट्रीय नियमों और यूएन चार्टर के सिद्धांतों को प्राथमिकता देना। इसके अलावा सुरक्षा चिंताओं का समाधान करना और सभी पक्षों की वैध सुरक्षा चिंताओं को गंभीरता से लेना ताकि भविष्य में संघर्ष की स्थिति न बने। इसके अलावा शांति प्रयासों का समर्थन करना, जो उन सभी पहलों को बढ़ावा देना जो युद्धविराम और बातचीत के माध्यम से समस्याओं का समाधान करने में सहायक हों।
ईरानी विदेश मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि तेहरान हमेशा से क्षेत्र में शांति और स्थिरता का पक्षधर रहा है। ईरान के अनुसार, चीन का यह प्रस्ताव न केवल निष्पक्ष है, बल्कि यह वर्तमान वैश्विक संकटों को समाप्त करने का एक व्यावहारिक रोडमैप भी प्रदान करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान का यह समर्थन चीन के साथ उसके मजबूत होते द्विपक्षीय संबंधों का परिणाम है।
ईरान ने साफ किया है कि बाहरी हस्तक्षेप की तुलना में क्षेत्रीय देशों और वैश्विक शक्तियों के बीच आपसी संवाद से ही स्थायी शांति संभव है। इस समर्थन के बाद मध्य पूर्व और अन्य संघर्ष क्षेत्रों में शक्ति संतुलन बदलने की उम्मीद जताई जा रही है।
पिछले कुछ वर्षों में चीन ने 'ग्लोबल सिक्योरिटी इनिशिएटिव' के तहत खुद को एक बड़े मध्यस्थ के रूप में स्थापित किया है। इससे पहले भी चीन ने ईरान और सऊदी अरब के बीच ऐतिहासिक समझौता कराकर दुनिया को चौंका दिया था। अब शी जिनपिंग के शांति प्रस्ताव को ईरान का साथ मिलना बीजिंग की कूटनीतिक जीत माना जा रहा है।
यह कदम उस समय आया है जब पश्चिमी देश, विशेषकर अमेरिका, ईरान पर प्रतिबंधों और कूटनीतिक दबाव के जरिये घेराबंदी कर रहे हैं। ऐसे में ईरान और चीन की यह जुगलबंदी वैश्विक राजनीति में एक नया ध्रुव बनाने की ओर संकेत करती है।
हालांकि ईरान का समर्थन एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन इस शांति प्रस्ताव को धरातल पर उतारना एक बड़ी चुनौती होगी। पश्चिमी देशों, विशेषकर नाटो गठबंधन के देशों ने अक्सर चीन की शांति पहलों को संदेह की दृष्टि से देखा है। फिर भी, अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का तर्क है कि यदि अन्य प्रमुख देश भी इस चार-सूत्री एजेंडे में शामिल होते हैं, तो यह वैश्विक स्तर पर जारी कई सैन्य संघर्षों को रोकने में मील का पत्थर साबित हो सकता है।
फिलहाल, दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि इस नए 'गठबंधन' का असर आने वाले हफ्तों में युद्धग्रस्त क्षेत्रों में किस तरह दिखाई देता है। बहरहाल,ईरान की ओर से शी जिनपिंग के प्रस्ताव का समर्थन करना यह दर्शाता है कि अब शांति की नई परिभाषाएं बीजिंग और तेहरान जैसे केंद्रों से लिखी जा रही हैं, जो आने वाले समय में वैश्विक व्यवस्था को पुनर्निर्धारित कर सकती हैं।
Updated on:
11 May 2026 07:59 pm
Published on:
11 May 2026 07:58 pm
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