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‘पाक में नहीं करनी चाहिए थी बातचीत’, अब पछता रहा ईरान, अमेरिका से डील नहीं होने की असली वजह भी बताई

ईरान के सांसद महमूद नबावियन ने पाकिस्तान में अमेरिका के साथ हुई बातचीत को “रणनीतिक गलती” बताया है। परमाणु मुद्दे पर बातचीत से अमेरिका का दबाव बढ़ा, जिससे तनाव और गहरा गया। जानिए इस बयान के पीछे की पूरी कहानी।

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भारत

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Mukul Kumar

Apr 24, 2026

US-Iran Ceasefire Extension 2026

पाक में अमेरिका-ईरान वार्ता। (AI Image)

पाकिस्तान में अमेरिकी नेताओं के साथ बातचीत करके ईरान अब पछता रहा है। ईरान-अमेरिका के बीच बढ़े तनाव और फिर से जंग शुरू होने की आहट तेज होने के बाद ईरान के अंदर से ही एक बड़ा बयान सामने आया है।

एक वरिष्ठ सांसद ने खुलकर माना है कि पाकिस्तान में अमेरिका के साथ बातचीत करना एक 'रणनीतिक गलती' थी। इस बयान ने कूटनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है।

'पाकिस्तान में बातचीत करना गलती थी'

ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति समिति के सदस्य महमूद नबावियन ने कहा कि पाकिस्तान में अमेरिका के साथ हुई बातचीत सही फैसला नहीं था।

उन्होंने साफ कहा कि उस मंच पर परमाणु मुद्दे को उठाना एक बड़ी रणनीतिक चूक थी, जिसका फायदा विरोधी पक्ष ने उठाया।

परमाणु मुद्दे पर दबाव बढ़ा

नबावियन के मुताबिक, बातचीत के दौरान अमेरिका ने ईरान पर सख्त शर्तें रखीं। इनमें 60 प्रतिशत तक समृद्ध यूरेनियम को हटाने और उसे लंबे समय तक रोककर रखने की मांग शामिल थी। ईरान ने इन शर्तों को मानने से इनकार कर दिया।

'दुश्मन और ज्यादा हिम्मत वाला हो गया'

ईरानी सांसद का कहना है कि जब परमाणु मुद्दे को बातचीत में शामिल किया गया, तो इससे अमेरिका का रुख और सख्त हो गया। उनके मुताबिक, इस कदम से विरोधियों को यह संदेश गया कि ईरान दबाव में आ सकता है, जिससे उनकी मांगें और बढ़ गईं।

ट्रंप का सख्त संदेश

दूसरी ओर, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने कहा कि अमेरिका पर किसी तरह का दबाव नहीं है और वह तभी कोई समझौता करेगा जब वह उसके हित में होगा। ट्रंप ने यह भी दावा किया कि ईरान की सैन्य ताकत को काफी नुकसान पहुंचा है और समय अब उसके पक्ष में नहीं है।

अमेरिकी राजनीति में भी दबाव

इस मुद्दे का असर अमेरिका की आंतरिक राजनीति पर भी दिख रहा है। कुछ नेताओं का मानना है कि अगर यह संघर्ष लंबा चलता है, तो सरकार पर दबाव बढ़ सकता है। रिपोर्ट्स के अनुसार, 60 दिन का समय इस मामले में अहम मोड़ साबित हो सकता है।

ईरान भी अड़ा

ईरान बातचीत की शर्तों पर सख्ती दिखा रहा है, जबकि अमेरिका अपने हितों को प्राथमिकता दे रहा है। ऐसे में यह देखना अहम होगा कि आने वाले दिनों में कूटनीति आगे बढ़ती है या टकराव और गहराता है।