
ईरान-अमेरिका तनाव के बीच हूतियों का सऊदी पर हमला | फोटो सोर्स-X(@Madhurendra13)
Trump-Iran talks: अमेरिका और ईरान युद्ध के कारण मिडिल ईस्ट में हालात पहले से ही खराब है। होर्मुज में नाकेबंदी के कारण दुनिया की अर्थव्यवस्था हिचकोले खा रही है। अब मध्य पूर्व में युद्ध के नए मोर्च खुलते हुए दिख रहे हैं। पहले सऊदी अरब और यमन के हूती विद्रोहियों के बीच सैन्य संघर्ष छिड़ा, तो वहीं मंगलवार देर रात सऊदी अरब और अमेरिका ने इराक ने शिया मिलिशिया संगठन पर बैलेस्टिक मिसाइलों से हमला कर दिया। इस हमले में कई लोगों के मारे जाने की सूचना है। सऊदी के सैन्य संघर्ष में कूदने की वजह से मध्य पूर्व में तेजी से हालात और समीकरण बदल रहे हैं।
यमन के हूती लड़ाकों और सऊदी अरब के बीच 2022 से शांत पड़ी लड़ाई एक बार फिर भड़क उठी है। 14 जुलाई को सऊदी समर्थित यमनी सरकार ने हूतियों के कब्जे वाले सना हवाई अड्डे पर बमबारी की, ताकि वहां किसी ईरानी विमान को उतरने से रोका जा सके। इसके जवाब में हूतियों ने सऊदी अरब की जमीन पर बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं और बाब-अल-मंडेब जलडमरूमध्य में सऊदी अरब की नौसैनिक नाकेबंदी का ऐलान कर दिया।
सऊदी अरब ने भी जवाबी कार्रवाई करते हुए हूतियों के कब्जे वाले होदेइदा बंदरगाह पर बमबारी की। इस बंदरगाह के जरिए यमन का 70 प्रतिशत व्यापार होता है। इस कार्रवाई से बौखलाकर हूतियों ने सऊदी की सरकारी तेल कंपनी अरामको के ठिकानों को निशाना बनाया, जिसकी वजह से कंपनी को अपनी 4 लाख बैरल प्रतिदिन क्षमता वाली जिजान रिफाइनरी को आंशिक रूप से बंद करना पड़ा। हालांकि माना जा रहा है कि सऊदी अरब यमन में पूरी तरह से जंग की तरफ नहीं लौटना चाहेगा, क्योंकि 2019 में हुए इसी तरह के हमलों के बाद रियाद ने बातचीत को ही स्थिरता का रास्ता माना था।
27 जुलाई को अमेरिका के संयुक्त राष्ट्र में राजदूत ने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप एक बार फिर बातचीत को मौका देना चाहते हैं। ट्रंप ने खुद कहा कि ईरान के अनुरोध पर दोस्ताना बातचीत चल रही है। हालांकि ईरान ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि बातचीत की पहल असल में अमेरिका की तरफ से हुई थी। ईरान का होरमुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण अभी भी बरकरार है और तेहरान ने ओमान के साथ-साथ अब सऊदी अरब को भी इन तकनीकी बातचीत में शामिल कर लिया है।
खाड़ी देशों को यह एहसास हुआ है कि विदेशी हथियारों पर निर्भरता के बावजूद अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाना जरूरी है। इसी सोच के तहत कुवैत ने पाकिस्तान के साथ सैन्य प्रशिक्षण, खुफिया जानकारी साझा करने और रक्षा तकनीक पर समझौता किया है। यह समझौता सितंबर 2025 में हुए सऊदी-पाकिस्तान रक्षा समझौते जैसा पूर्ण सैन्य सहयोग नहीं है, लेकिन इससे साफ है कि खाड़ी के देश पाकिस्तान को लंबे समय के भरोसेमंद साझेदार के तौर पर देख रहे हैं।
सऊदी अरब ने 22 जुलाई को अमेरिका के साथ परमाणु ऊर्जा सहयोग के लिए समझौता भी किया है, जिससे ईरान अपने परमाणु संवर्धन के दावे को और मजबूत मान रहा है। ऐसे में अमेरिका ईरान के परमाणु ठिकानों पर फिर हमला कर सकता है। फिलहाल क्षेत्र में शांति बहुत दूर की बात नजर आ रही है।
Updated on:
29 Jul 2026 12:49 pm
Published on:
29 Jul 2026 12:49 pm
