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जुमे की नमाज न पढ़ने पर 2 साल की सजा, मलेशिया के इस राज्य ने सुनाया फरमान

मलेशिया के तेरेंगानु राज्य में शरिया कानूनों को सख्त करते हुए सरकार द्वारा चेतावनी दी गई। जुमे की नमाज छोड़ने वाले मुस्लिम पुरुषों को दो साल तक की जेल और 3,000 रिंगिट (लगभग 62,000 रुपये) तक का जुर्माना या दोनों सजा होगी।

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भारत

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Devika Chatraj

Aug 20, 2025

जुमे की नमाज न पढ़ने पर 2 साल की सजा (AI Image )

मलेशिया के तेरेंगानु राज्य में एक सख्त शरिया कानून लागू किया गया है, जिसके तहत बिना वैध कारण के जुमे की नमाज छोड़ने वाले मुस्लिम पुरुषों को दो साल तक की जेल और 3,000 रिंगिट (लगभग 62,000 रुपये) तक का जुर्माना या दोनों सजा भुगतनी पड़ सकती है। यह घोषणा पैन-मलेशियाई इस्लामिक पार्टी (PAS) के नेतृत्व वाली तेरेंगानु सरकार ने 18 अगस्त 2025 को की।

नए संशोधन में नमाज न पढ़ने पर सजा का प्रावधान

इससे पहले तेरेंगानु में लगातार तीन बार जुमे की नमाज छोड़ने पर अधिकतम छह महीने की जेल या 1,000 रिंगिट (लगभग 20,000 रुपये) का जुर्माना लगाया जाता था। नए संशोधन के बाद अब पहली बार नमाज न पढ़ने पर ही सजा का प्रावधान है। राज्य की कार्यकारी परिषद के सदस्य मुहम्मद खलील अब्दुल हादी ने कहा, "जुमे की नमाज न केवल धार्मिक प्रतीक है, बल्कि यह मुसलमानों के बीच आज्ञाकारिता का प्रतीक है।"

कानून लागू करने का तरीका

इस कानून को लागू करने के लिए मस्जिदों में साइनबोर्ड लगाए जाएंगे, जो लोगों को इस नियम की जानकारी देंगे। प्रवर्तन को अंतिम उपाय के रूप में लागू किया जाएगा, यदि मस्जिद की चेतावनियों को नजरअंदाज किया गया।

फैसले पर विवाद

इस फैसले ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विवाद खड़ा कर दिया है। इसे मानवाधिकारों के खिलाफ और धार्मिक कट्टरता की ओर बढ़ता कदम माना जा रहा है। कुछ लोगों ने इसे तालिबान जैसे कठोर नियमों की तुलना में देखा है। मलेशिया में प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम के कार्यकाल में धार्मिक रूढ़िवादिता बढ़ने की बात भी सामने आई है, जैसे कि हाल ही में एक प्राचीन मंदिर को हटाकर मस्जिद बनाने का मामला।

शरिया कानून में सख्ती

जुमे की नमाज इस्लाम में एक महत्वपूर्ण सामूहिक प्रार्थना है, जो हर शुक्रवार को दोपहर में मस्जिद में पढ़ी जाती है। यह पुरुषों के लिए अनिवार्य मानी जाती है, हालांकि महिलाओं और बीमार या यात्रा पर रहने वालों को छूट है। तेरेंगानु का यह कदम बहु-सांस्कृतिक मलेशिया में शरिया कानून के सख्ती से लागू होने की ओर इशारा करता है, जिससे धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकारों पर बहस तेज हो गई है।