
Geopolitics: दुनिया की भू-राजनीति में इन दिनों तेजी से बदलाव देखने को मिल रहा है। एक तरफ जहां अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ 'ड्रैगन' यानि चीन इस संकट को एक अवसर के रूप में देख रहा है। मध्य पूर्व में मंडराते युद्ध के बादलों के बीच चीन ने शांति दूत बनने की पहल की है। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने खाड़ी देशों में शांति और स्थिरता कायम करने के लिए एक विशेष 4 सूत्री फॉर्मूला दुनिया के सामने रखा है। यह प्रस्ताव चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने शेयर किया है।
अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के साथ बीजिंग में हुई एक अहम बैठक के दौरान शी जिनपिंग ने इस शांति प्रस्ताव का खाका खींचा। इस प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य खाड़ी देशों के बीच आपसी दूरियों को मिटाना और अमेरिका की गैर-मौजूदगी या उसकी विवादित नीतियों के बीच चीन को एक भरोसेमंद साझीदार के रूप में पेश करना है।
शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का सिद्धांत: चीन का मानना है कि खाड़ी देश एक-दूसरे के पड़ोसी हैं और उन्हें मिलकर रहना ही होगा। जिनपिंग के पहले बिंदु के अनुसार, इन देशों को अपने संबंध सुधारने चाहिए ताकि मध्य पूर्व में एक साझा, सहयोगी और टिकाऊ सुरक्षा ढांचा तैयार किया जा सके।
राष्ट्रीय संप्रभुता का सम्मान: किसी भी देश के विकास के लिए उसकी संप्रभुता सबसे अहम है। दूसरे प्रस्ताव में यह स्पष्ट किया गया है कि सभी खाड़ी देशों की क्षेत्रीय अखंडता और सुरक्षा का पूरी तरह से सम्मान किया जाना चाहिए। किसी भी बाहरी ताकत को उनके आंतरिक मामलों में दखल नहीं देना चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन: तीसरे बिंदु में संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों को लागू करने पर जोर दिया गया है। जिनपिंग ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों को संयुक्त राष्ट्र के मूल नियमों और अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में ही संचालित किया जाना चाहिए।
विकास और सुरक्षा में संतुलन: चौथे और अंतिम बिंदु में चीन ने सुरक्षा और विकास को एक-दूसरे का पूरक बताया है। चीन का कहना है कि वह खाड़ी देशों के साथ अपनी आधुनिक तकनीक और विकास के अवसर साझा करने के लिए पूरी तरह तैयार है, ताकि इस पूरे क्षेत्र को आर्थिक रूप से मजबूत बनाया जा सके।
चीन का यह कदम बेहद रणनीतिक है। जब अमेरिका और ईरान के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य और अन्य मुद्दों को लेकर तनातनी चरम पर है, तब चीन का यह शांति राग उसे मध्य पूर्व में एक बड़ी कूटनीतिक जीत दिला सकता है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या ड्रैगन सच में इस क्षेत्र में शांति ला पाएगा या यह सिर्फ उसके व्यापारिक हितों को साधने का एक नया पैंतरा है।
विदेशी मामलों के जानकारों का मानना है कि चीन का यह कदम अमेरिका के प्रभुत्व को चुनौती देने की एक सोची-समझी रणनीति है। खाड़ी देशों के नेता इस प्रस्ताव को सकारात्मक रूप से ले रहे हैं क्योंकि वे भी क्षेत्र में एकतरफा अमेरिकी निर्भरता से बचना चाहते हैं। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि ईरान और अमेरिका इस 4 सूत्री फॉर्मूले पर क्या आधिकारिक प्रतिक्रिया देते हैं। साथ ही, क्या चीन इस योजना के तहत सऊदी अरब और ईरान के बीच हुए पिछले शांति समझौते की तरह कोई नया बड़ा समझौता करवा पाएगा? इस पर वैश्विक मीडिया की नजर बनी रहेगी।
इस पूरी कूटनीति के पीछे चीन का एक बहुत बड़ा आर्थिक स्वार्थ भी छिपा है। चीन अपनी ऊर्जा जरूरतों (पेट्रोलियम) के लिए काफी हद तक मध्य पूर्व पर निर्भर है। अगर अमेरिका-ईरान तनाव के कारण इस क्षेत्र में युद्ध भड़कता है, तो चीन की तेल सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित होगी। इसलिए चीन अपने व्यापारिक हितों की रक्षा के लिए यहां हर हाल में शांति चाहता है। ( इनपुट : ANI)
Updated on:
14 Apr 2026 03:31 pm
Published on:
14 Apr 2026 03:31 pm
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