
तुर्किये के अंका में आयोजित नाटो सम्मेलन के अवसर पर गश्त करता पुलिस जवान। (फोटो:द वॉशिंगटन पोस्ट)
NATO Summit Donald Trump Pressure and India : तुर्किये के अंकारा में मंगलवार को नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (NATO) का आयोजन किया जा रहा है। इस बार का सम्मेलन ताकत और गोला-बारूद केंद्रित है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार यह सम्मेलन अमेरिका व इजरायल और ईरान के बीच हालिया टकराव और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस भारी दबाव के बीच हो रहा है जिसमें वे सहयोगियों से रक्षा खर्च बहुत अधिक बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। अहम पहलू यह है कि ट्रंप को खुश करने के लिए नाटो नेता अरबों डॉलर के हथियारों के सौदों का ऐलान कर रहे हैं। अहम समझौतों में नाटो का अपने पुराने अवाक्स बेड़े स्वीडन के साब ग्लोबल आई से बदलना, कनाडा का जर्मनी से पनडुब्बियां खरीदना और नीदरलैंड का 3 अरब यूरो से अधिक के रक्षा प्रोजेक्ट्स का ऐलान करना शामिल है।
रिपोर्ट के अनुसार कई देश ऐसा यह दिखाने के लिए कर रहे हैं कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ शिखर सम्मेलन में शामिल होने से पहले, वे यूरोप की सुरक्षा के लिए अधिक खर्च करने की अमेरिका की अपील पर ध्यान दे रहे हैं। एक ऐतिहासिक बदलाव के तहत, नाटो सदस्य स्पेन को छोड़ कर ट्रंप की मांगें मानते हुए रक्षा खर्च जीडीपी 5% तक बढ़ाने पर सहमत हुए हैं, जो पहले के 2% के लक्ष्य से दुगुने से भी अधिक है।
रिपोर्ट के मुताबिक नाटो के सभी 32 सदस्य देशों के नेता इस समिट में शिरकत कर रहे हैं। इसमें 32 पूर्ण सदस्य देशों के अलावा, कई पार्टनर देश और अंतरराष्ट्रीय संगठन भी इसमें शामिल हो रहे हैं, जिनमें यूक्रेन नाटो यूक्रेन काउंसिल के ज़रिए हिस्सा ले रहा है तो ऑस्ट्रेलिया, जापान, न्यूजीलैंड और दक्षिण कोरिया जैसे इंडो-पैसिफिक पार्टनर देश, और बहरीन, कुवैत, कतर और यूएई जैसे मध्य-पूर्व के देश भागीदारी निभा रहे हैं।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार भारत औपचारिक रूप से नाटो समिट में सदस्य के तौर पर शामिल नहीं होता है, लेकिन इस गठबंधन के साथ मजबूत बातचीत बनाए रखता है। नाटो और उसके सदस्य देशों के साथ जुड़ कर, भारत को कई अहम फायदे मिलते हैं, मसलन एडवांस्ड मिलिट्री टेक्नोलॉजी तक पहुंच, बेहतर इंटेलिजेंस शेयरिंग, मजबूत इंडो-पैसिफिक सुरक्षा और जॉइंट रीजनल चुनौतियों से निपटने के लिए एक रणनीतिक संतुलन कायम रखना। भारत के इससे जुड़ने के मुख्य तरीके और फायदे :
नाटो देशों के साथ तालमेल से भारत को अत्याधुनिक डिफेंस हार्डवेयर और नई टेक्नोलॉजी आसानी से मिल रही है, जिससे देश में ही डिफेंस से जुड़े उपकरण बनाने के उसके लक्ष्य पूरे करने में मदद मिल रही है।
नाटो के साथ बातचीत से रियल-टाइम इंटेलिजेंस नेटवर्क बेहतर होता है और मालाबार जैसे जॉइंट एक्सरसाइज में पश्चिमी सेनाओं के साथ मिलकर काम करने की भारतीय सेना की क्षमता बढ़ती है। गठबंधन के साथ जुड़ने से भू-राजनीतिक खतरों के खिलाफ प्रतिरोध मजबूत होता है, खासकर समुद्री सुरक्षा और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के प्रभाव का मुकाबला करने के मामले में आसानी रहेगी।
भारत 'स्विंग स्टेट' के तौर पर अपनी पोजीशन का आतंकवाद, साइबर सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन जैसे वैश्विक सुरक्षा मुद्दों से निपटने के लिए इस्तेमाल करता है। साथ ही, वह आपसी रक्षा समझौतों में बंधे बिना अपनी रणनीतिक स्वायत्तता की मुख्य नीति को भी बनाए रखता है। हालांकि इन रिश्तों को और मजबूत करने के लिए 'नाटो प्लस' जैसे फ्रेमवर्क के प्रस्ताव हैं, लेकिन भारत आम तौर पर क्वाड जैसे बहुपक्षीय समूहों में अपनी भागीदारी को प्राथमिकता देता है।
मीडिया रिपोटर्स का कहना है कि अगर भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता की नीति छोड़ता है, तो वैश्विक स्तर पर उसकी कूटनीतिक आजादी और काम करने की स्वतंत्रता सीमित हो जाएगी। नाटो में बहुत अधिक शामिल होने से भारत का ध्यान उसकी मुख्य और तत्काल सुरक्षा प्राथमिकताओं मसलन सीमा विवाद और क्षेत्रीय स्तर पर आतंकवाद विरोधी कदम से हटकर यूरो-अटलांटिक या भू-राजनीतिक एजेंडे की ओर जा सकता है। वहीं नाटो से औपचारिक रूप से जुड़ने से रूस के साथ भारत के लंबे समय से चले आ रहे रक्षा और कूटनीतिक रिश्ते खराब हो सकते हैं, जिससे भू-राजनीतिक स्तर पर कई चुनौतियां पैदा हो सकती हैं।
Updated on:
07 Jul 2026 02:44 pm
Published on:
07 Jul 2026 02:39 pm
