
कबूतर (File Photo)
हज़ारों वर्षों से कबूतर (Pigeons) इंसानों के संदेशवाहक रहे हैं। सैकड़ों किलोमीटर दूर से भी वो अपने घर का रास्ता ढूंढ़ लेते हैं। साइंस जर्नल में प्रकाशित एक नई रिसर्च ने कबूतरों के ‘नेविगेशन सिस्टम’ यानी 'जीपीएस' (GPS) पर चौंकाने वाला दावा किया है। इस रिसर्च के अनुसार इसका राज आंखों, चोंच या कान में नहीं, बल्कि उनके लिवर में छिपा हो सकता है।
वैज्ञानिकों की टीम ने कबूतरों के शरीर में पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र को महसूस करने वाले संकेतों की तलाश की। रिसर्च के दौरान सबसे मज़बूत चुंबकीय संकेत लिवर में मिले। वैज्ञानिकों के अनुसार मौजूद विशेष प्रतिरक्षा कोशिकाएं लाल रक्त कोशिकाओं को तोड़कर आयरन जमा करती हैं। रिसर्च में दावा किया गया है कि कबूतरों की ये कोशिकाएं सुपरपैरामैग्नेटिक गुण रखती हैं और पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र को महसूस कर सकती हैं।
वैज्ञानिकों की टीम ने जब कबूतरों के लिवर में इन प्रतिरक्षा कोशिकाओं को अस्थायी रूप से हटाया और कबूतरों को उड़ाया, तो वो सही दिशा पहचानने में असफल रहे। खास बात यह रही कि समस्या केवल बादलों वाले दिनों में दिखी। साफ मौसम में कबूतरों को दिशा तय करने में परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा। वैज्ञानिकों के अनुसार साफ मौसम में कबूतर सूरज और दृश्य निशानों की मदद से अपना रास्ता ढूंढ लेते हैं, लेकिन बादल होने पर वो ऐसा नहीं कर पाते।
रिसर्च में वैज्ञानिकों की टीम ने बताया कि कबूतरों के लिवर की ये आयरन-समृद्ध कोशिकाएं तंत्रिका तंतुओं के पास स्थित होती हैं और चुंबकीय संकेतों को दिमाग तक पहुंचाने में मदद करती हैं। इन वैज्ञानिकों का मानना है कि कबूतरों को प्रकृति से एक बायोलॉजिकल जीपीएस मिला है, जिससे उन्हें रास्ता ढूंढने में आसानी मिलती है। हालांकि कुछ वैज्ञानिक इससे सहमत नहीं हैं। इन वैज्ञानिकों का मानना है कि चुंबकीय दिशा-ज्ञान का रहस्य सिर्फ एक अंग में नहीं छिपा हो सकता। जर्मनी के मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट ऑफ एनिमल बिहेवियर के मार्टिन विकेल्स्की के अनुसार चुंबकीय संवेदन पर करीब 100 सालों से एक रहस्य बना हुआ है। वैज्ञानिकों के अनुसार अन्य पक्षी और चूहे भी इसी तरह की चुंबकीय जीपीएस का उपयोग कर सकते हैं।
Updated on:
07 Jun 2026 06:31 am
Published on:
07 Jun 2026 06:29 am
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