
तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तय्यिप एर्दोगन। (फोटो- ANI)
रूस का यूक्रेन पर हमला शुरू होने के बाद से नाटो फिर सक्रिय हो गया। इसको लेकर नाटो देशों ने अपना रक्षा बजट बढ़ाया और सैन्य सुरक्षा पर गंभीरता से सोचना शुरू किया। लेकिन दक्षिण में एक नया समीकरण चुपचाप बन रहा है।
मक्का पैक्ट नाम का यह समझौता यूरोप के लिए उतना ही चिंता का विषय होना चाहिए जितना पूर्वी मोर्चा है। यह समझौता 7 अगस्त को पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच हुआ।
मध्य पूर्व और हालिया अमेरिका-ईरान तनाव से आगे जाकर इसकी असली अहमियत तुर्की की भूमिका में छिपी है। तुर्की कोई दूर का मिडिल ईस्ट देश नहीं है। इसकी सीमा ग्रीस और बुल्गारिया से लगती है। बोस्फोरस और डार्डानेल्स स्ट्रेट इसके नियंत्रण में हैं।
सीरिया और लीबिया में भी इसकी सैन्य मौजूदगी बढ़ चुकी है। पूर्वी भूमध्य सागर में ग्रीस और साइप्रस के साथ समुद्री सीमाओं, क्षेत्रीय जल और आर्थिक क्षेत्रों को लेकर पुराना विवाद भी जारी है।
तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तय्यिप एर्दोगन पिछले एक दशक से एक खास नीति पर चल रहे हैं। वे नाटो छोड़ना नहीं चाहते, लेकिन अपनी विदेश नीति भी नाटो के हिसाब से तय नहीं करना चाहते।
पश्चिमी गठबंधन में रहते हुए स्वतंत्र राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य प्रभाव का अपना क्षेत्र बनाना उनका लक्ष्य है। यूरोपीय देशों को यह नीति अक्सर उलझी हुई लगती है।
तुर्की ने रूसी एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम खरीदी, फिर भी नाटो में बना रहा। यूक्रेन का समर्थन किया लेकिन मास्को से रिश्ते भी बनाए रखे। यूरोपीय संघ से प्रवास समझौते किए, साथ ही ग्रीस और साइप्रस से टकराव भी जारी रखा।
लीबिया और सीरिया में सैन्य दखल दिया बिना यूरोप या अमेरिका की सहमति का इंतजार किए। अब यह मक्का समझौता सिर्फ पारंपरिक आपसी रक्षा व्यवस्था तक सीमित नहीं रह सकता। यह आगे चलकर रक्षा उद्योग साझेदारी का रूप भी ले सकता है। पूर्वी भूमध्य सागर में यह खास मायने रखता है।
ग्रीस और तुर्की दोनों नाटो सहयोगी हैं, लेकिन उनके मूल विवाद कभी हल नहीं हुए। एजियन सागर, साइप्रस, क्षेत्रीय जल, हवाई क्षेत्र और समुद्री आर्थिक क्षेत्र लगातार तनाव पैदा करते रहते हैं।
तुर्की का ब्लू होमलैंड सिद्धांत उस समुद्री व्यवस्था को चुनौती देता है जिसे ग्रीस और साइप्रस स्थापित मानते हैं। यूरोप अगर सिर्फ पूर्व की ओर देखता रहा तो दक्षिण का यह नया रणनीतिक ढांचा उसके लिए बड़ा सिरदर्द बन सकता है।
विश्लेषकों का मानना है कि मक्का पैक्ट की तरफ यूरोपीय देशों को ज्यादा गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है। यह सिर्फ मध्य पूर्व का मामला नहीं रह गया है।
Updated on:
23 Aug 2026 03:52 pm
Published on:
23 Aug 2026 03:52 pm
