
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला मोजतबा खामेनेई। ( फोटो: ANI)
Iran War: अमेरिका और ईरान के बीच फिलहाल सैन्य कार्रवाई रुकी हुई है और दोनों देश बातचीत की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इसके बावजूद युद्ध का असर खत्म नहीं हुआ है। होर्मुज़ स्ट्रेट, रेड सी और अब कैस्पियन सागर तक बढ़ते तनाव ने ईरान की अर्थव्यवस्था पर नया दबाव बना दिया है। तेल निर्यात में रुकावट, ईंधन की कमी, बिजली संकट और घटते व्यापार के कारण देश की आर्थिक स्थिति और कठिन होती दिख रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समुद्री रास्तों पर तनाव लंबा चला तो ईरान को आने वाले महीनों में और बड़ी आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
ईरान की अर्थव्यवस्था काफी हद तक तेल निर्यात पर निर्भर है। पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार, युद्ध के दौरान देश ने 11.5 अरब डॉलर का कच्चा तेल बेचा, जबकि अमेरिका के साथ हुए अस्थायी समझौते की अवधि में 6.5 अरब डॉलर का अतिरिक्त निर्यात हुआ। हालांकि जुलाई के मध्य से अमेरिका की नौसैनिक नाकाबंदी दोबारा लागू होने के बाद तेल निर्यात पर फिर दबाव बढ़ गया है। खार्ग द्वीप, जहां से लगभग 90 प्रतिशत कच्चा तेल निर्यात होता है, सबसे अधिक प्रभावित हो सकता है। यदि यह स्थिति लंबी चली तो तेल उत्पादन, पेट्रोकेमिकल उद्योग और सरकारी आय पर गंभीर असर पड़ सकता है।
युद्ध के दौरान अमेरिका और इजरायल के हमलों से ईरान के गैस उत्पादन को भी नुकसान पहुंचा। सरकार के अनुसार प्रतिदिन लगभग 230 मिलियन घन मीटर गैस उत्पादन प्रभावित हुआ, जिससे बिजली और उद्योगों के लिए ईंधन की कमी बढ़ गई। देश पहले से ही प्रतिदिन 20 मिलियन लीटर पेट्रोल की कमी झेल रहा है। इस वजह से सरकार पेट्रोल की ऊंची कीमतों और सीमित खपत जैसे विकल्पों पर विचार कर रही है। हालांकि पहले भी ईंधन की कीमत बढ़ने पर देशभर में बड़े विरोध प्रदर्शन हो चुके हैं, इसलिए सरकार के लिए यह फैसला आसान नहीं होगा। कई शहरों में बिजली कटौती जारी है, जिससे पानी और संचार सेवाएं भी प्रभावित हो रही हैं।
चीन ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार और तेल खरीदार है, लेकिन युद्ध के कारण दोनों देशों के बीच व्यापार भी प्रभावित हुआ है। चीनी आंकड़ों के अनुसार, गैर-तेल व्यापार में पिछले वर्ष की तुलना में करीब 75 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। दूसरी ओर, होर्मुज़ स्ट्रेट के साथ-साथ बाब अल-मंदेब और कैस्पियन सागर में भी तनाव बढ़ गया है। यमन के हूती समूह की कार्रवाई और कैस्पियन सागर में एक ईरान से जुड़े जहाज पर हमले ने नए समुद्री व्यापार मार्गों को भी जोखिम में डाल दिया है। इससे आयात-निर्यात की लागत और बीमा खर्च बढ़ने की आशंका है। लगातार बढ़ते आर्थिक दबाव के बीच ईरान में गरीबी, महंगाई और लोगों की क्रय शक्ति में गिरावट भी बड़ी चिंता बनी हुई है। ऐसे में आने वाले समय में देश की आर्थिक स्थिति काफी हद तक युद्ध, समुद्री सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय बातचीत के नतीजों पर निर्भर करेगी।
Updated on:
27 Jul 2026 12:35 pm
Published on:
27 Jul 2026 12:14 pm
