
50 पार महिलाओं में बढ़ रहा है तलाक का चलन PIc Source: AI Generated
Gray Divorces: 50-60 की उम्र में अक्सर लोग अपने लाइफ पार्टनर के साथ रिटायरमेंट लाइफ को इन्जॉय करना चाहते हैं, लेकिन एशिया में इस उम्र की महिलाओं में तलाक का चलन बढ़ रहा है। जापान की ईको तोयामा भी उन्हीं महिलाओं में से एक हैं। उन्होंने 60 की दहलीज पर पहुंचने के बाद तलाक लिया और अब खुद को अधिक स्वतंत्र महसूस करती हैं। वैसे ‘ग्रे डिवोर्स’ यानी 50 साल या उससे ज़्यादा उम्र के जोड़ों का अलग होना, का ट्रेंड अमेरिका जैसे देशों में भी बढ़ा है, लेकिन एशिया में इसकी रफ्तार काफी तेज हो गई है।
ईको तोयामा काफी पहले ही अपने पति से अलग होना चाहती थीं, लेकिन घर-परिवार की जिम्मेदारियों ने उन्हें रोके रखा। सीएनएन से बात करते हुए उन्होंने बताया कि मैंने शादी के बाद घर के सारे काम किए और बच्चों की देखभाल की, साथ ही परिवार को आर्थिक रूप से भी सहारा दिया। हालांकि, मेरा पति मेरी सोशल लाइफ से लेकर करियर से जुड़ी महत्वाकांक्षाओं तक, हर चीज़ को कंट्रोल करना चाहता था, जिससे मुझे घुटन और उदासी महसूस होती थी। फिर भी, मैं अपने दो बच्चों की खातिर इस रिश्ते में बनी रहीं। आखिरकार, 60 साल की उम्र में हालात बदले। बड़े हो चुके बेटों को अब मेरी खास ज़रूरत नहीं है, और पति भी स्वस्थ हैं, इसलिए यह मेरे लिए अपनी जिंदगी की नई शुरुआत करने का मौका था और मैंने उसका लाभ उठाया। अब मैं अधिक स्वतंत्र हूं, आजाद हूं और अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जी सकती हूं।
एशियाई देशों में बढ़ते ग्रे डिवोर्स के पीछे अक्सर वो महिलाएं होती हैं, जिन्हें लंबे समय से समाज में जेंडर से जुड़ी पाबंदियों का सामना करना पड़ता है, उनके पास अपनी जिंदगी को अपने हिसाब से जीने की आजादी नहीं होती। वह परिवार की जिम्मेदारियों के बीच फंसी रहती हैं और जब उन्हें अहसास होता है कि उनकी जिम्मेदारी खत्म हो गई है, तो वे तलाक लेकर नई शुरुआत करती हैं।
उदाहरण के लिए, जापान में दशकों की शादी के बाद अलग होने वाले जोड़ों में, 2024 में पुरुषों के मुकाबले दोगुनी महिलाओं ने तलाक के लिए अर्ज़ी दी थी। वहीं, पिछले साल दक्षिण कोरिया में, कम से कम 30 साल से शादीशुदा जोड़ों के बीच तलाक की संख्या उन युवा जोड़ों के तलाक से ज़्यादा हो गई जिनकी शादी को 5 साल से भी कम समय हुआ था – ऐसा पहली बार हुआ है। इसी तरह, ताइवान में भी लंबे समय से शादीशुदा जोड़ों के बीच तलाक के मामले बढ़े हैं। हांगकांग की कई लॉ फर्मों ने 'ग्रे डिवोर्स' में बढ़ोतरी की बात स्वीकारी हैं। चीन में भी आंकड़े तेजी से बढ़े हैं। पिछले 30 सालों में बुजुर्गों के तलाक की संख्या दोगुनी हुई है।
ग्रे डिवोर्स पर 2003 में रिसर्च पेपर लिखने वाले कैनसस की वॉशबर्न यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र की एसोसिएट प्रोफेसर सांगयूब पार्क का कहना है कि एक समय ऐसा था जब किसी महिला के लिए तलाक का मतलब था जिंदगी का खत्म होना। लेकिन अब स्थिति बदल रही है। अधिकांश महिलाएं आत्मनिर्भर बन रही हैं। जीवन के आखिरी पड़ाव में तलाक की एक वजह ये भी है। एशिया में लाइफ स्पैन दूसरे कॉन्टिनेंट्स के मुकाबले अधिक है, लोग ज्यादा समय तक जीते हैं, इसलिए यहां ग्रे डिवोर्स के मामले भी ज्यादा देखने को मिलते हैं।
एक्स्पर्ट्स का कहना है कि आने वाले दशक में एशिया की बुजुर्ग आबादी की तस्वीर बदल सकती है। ज्यादा लोग अकेले रहेंगे और उन्हें ज़्यादा कल्याणकारी सहायता की ज़रूरत होगी। उनके मुताबिक, कानूनी सुधारों के चलते भी महिलायें 50 से 60 साल की उम्र में तलाक लेने का साहस जुटा पाती हैं। इन सुधारों ने उन महिलाओं के लिए सुरक्षा का घेरा बनाया है, जिन्हें पहले अपनी ज़िंदगी चलाने के लिए पतियों पर निर्भर रहना पड़ता था।
उदाहरण के लिए, दक्षिण कोरिया ने 2014 में फैसला सुनाया कि पेंशन और नौकरी छूटने पर मिलने वाली रकम (severance pay) को संपत्ति के बंटवारे में शामिल किया जा सकता है। इसका मतलब है कि अगर किसी महिला ने शादी के दौरान घर का सारा काम और बच्चों की देखभाल की, जिससे उसका पति नौकरी कर सका, तो तलाक के बाद वह पति की पेंशन का कुछ हिस्सा पाने की हकदार है।
जापान ने भी 2007 में ऐसा ही सुधार लागू किया था। हालांकि, इन सुधारों के बावजूद, लिंग के आधार पर असमानता अभी भी बनी हुई है। ईको तोयामा ने जापान में महिलाओं को मिलने वाले कम वेतन की ओर इशारा करते हुए कहा कि महिलाओं के लिए, तलाक न ले पाने की मुख्य वजह आर्थिक रूप से आज़ाद न हो पाना है।
50 साल की ईमान लाउ ने भी तलाक लेकर अपनी जिंदगी को नए सिरे से जीना शुरू कर दिया है। अपने पति की बेवफाई के बावजूद वह रिश्ता निभाती रहीं, लेकिन फिर उन्होंने साहस दिखाकर अलग होने का निर्णय लिया और आज वह अपने इस फैसले से खुश हैं। उन्होंने कहा, मैं काफी पारंपरिक महिला हूं। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरा तलाक होगा। यह ईमान लाउ के लिए एक सदमे जैसा था, जैसे उन्होंने अपना कोई अंग खो दिया हो। लेकिन इससे उन्हें यह भी अहसास हुआ कि 14 साल की उस शादी में कहीं न कहीं उन्होंने अपनी पहचान खो दी थी।
दोस्तों और अपनी पसंद की चीज़ों को नज़रअंदाज़ करके वह बस पति के इर्द-गिर्द घूमती रहती थीं। तलाक के बाद वह ऑनलाइन मीटअप ग्रुप्स में शामिल हुईं और नए दोस्त बनाए। उन्हें आउटडोर एक्टिविटीज़ पसंद आने लगीं और हाइकिंग, स्विमिंग, कयाकिंग और स्नॉर्कलिंग करने लगीं। वह पियानो बजाना सीख रही हैं और उन्हें जैज़ संगीत पसंद है। पूरे यूरोप की यात्रा करने के बाद, उन्होंने छुट्टियों की तस्वीरें प्रिंट करवाईं और अपने अपार्टमेंट में लगाईं; यह उनकी ‘हैप्पी वॉल’ है, जो उन्हें ट्रेकिंग और कैंपिंग के दौरान मिली खुशी की याद दिलाती है।
लाउ ने जब अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को बताया कि उन्होंने अपनी शादी खत्म कर दी है, तो जवाब एक जैसे नहीं आए। किसी ने उन्हें गले लगाया, किसी ने बधाई तक दे डाली, लेकिन कुछ लोगों की आंखों में वही पुराना सवाल तैर रहा था, ‘आखिर गलती किसकी थी?’ इसी तरह के रिएक्शन असल में उस बदलते समाज की तस्वीर दिखाते हैं, जहां बड़ी उम्र में तलाक अब न तो पूरी तरह स्वीकार्य है, न पूरी तरह बुरा माना जाता है।
दूसरी तरफ तोयामा का अनुभव इससे काफी अलग रहा। जब उन्होंने अपने तलाक की बात सामने रखी, तो ज्यादातर लोगों ने उन्हें सराहा, कुछ ने तो खुलकर कहा कि उन्हें भी तोयामा जैसी हिम्मत चाहिए थी। यानी एक ही फैसला, दो अलग शहरों और दो अलग सामाजिक दायरों में, बिल्कुल अलग नजरिए से देखा गया।
यह सिर्फ इन दोनों महिलाओं की कहानी नहीं है। रिसर्चर पार्क का कहना है कि अधेड़ उम्र और बुजुर्ग जोड़ों में तलाक, जिसे अंग्रेजी में ‘ग्रे डिवोर्स’ कहा जाता है, अब लगातार बढ़ रहा है। इसकी एक बड़ी वजह है मिलेनियल पीढ़ी, जिसने बिल्कुल अलग सामाजिक माहौल और सोच के साथ शादी की थी। जैसे-जैसे यह पीढ़ी रिटायरमेंट की उम्र के करीब पहुंचेगी, तभी जाकर यह आंकड़ा थमने की उम्मीद है। मगर पार्क के मुताबिक इसमें अभी करीब एक दशक और लगेगा, यानी आने वाले सालों में ऐसे तलाक और बढ़ते ही जाएंगे, घटने की गुंजाइश फिलहाल कम है।
भारत में भी यह तस्वीर अब उतनी अजनबी नहीं रही जितनी बीस साल पहले थी। बड़े शहरों में आजकल पचास और साठ की उम्र पार कर चुके पति-पत्नी भी अलग होने का फैसला ले रहे हैं, जिसे पहले ‘बच्चों की खातिर निभा लो’ कहकर टाल दिया जाता था। बच्चे बड़े होकर घर से निकल जाते हैं, आर्थिक आजादी बढ़ती है, और तब कई लोग खुद से पूछते हैं कि बाकी की जिंदगी किस तरह जीनी है। यह ठीक वही सवाल है जो पश्चिमी देशों में लाओ और तोयामा जैसी महिलाएं खुद से पूछ चुकी हैं।
Updated on:
27 Jul 2026, 4:11 PM IST
Published on:
27 Jul 2026, 12:45 PM IST
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