
When taliban killed Afghanistan president Mohammad Najibullah and hung him on a pole with his brother
नई दिल्ली। आतंकी संगठन तालिबान ने इस समय पूरे अफगानिस्तान पर कब्ज़ा कर लिया है। ऐसा तालिबान ने अमरीकी सेना के हाल ही में अफगानिस्तान छोड़ने के बाद किया है। ऐसे में जहां अफगानिस्तान की जनता में अफरा-तफरी और डर का माहौल है, वही विश्व-भर में यह चिंता का एक विषय है। आतंक के इस माहौल में अफगानिस्तान के वर्तमान राष्ट्रपति अशरफ गनी और उपराष्ट्रपति अमरूल्ला सालेह भी अपनी जान बचाने के लिए अफगानिस्तान छोड़कर भाग गए हैं। इसी अफरा-तफरी के बीच भारत और अमरीका समेत कई अन्य देश भी अफगानिस्तान में फंसे हुए अपने नागरिकों को हवाईजहाजों से एयरलिफ्ट कर रहें हैं।
ऐसे हालात पहली बार पैदा नहीं हुए हैं
अफगानिस्तान में वर्तमान समय में जो हालात हैं वो पहले भी देखे जा चुके हैं। 1996 में जब तालिबान (Taliban) ने पहली बार अफगानिस्तान पर कब्ज़ा किया था। उस समय भी आतंक और अफरा-तफरी के ऐसे ही हालात अफगानिस्तान में पैदा हो गए थे जो वर्तमान में हुए हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि अफगानिस्तान के वर्तमान राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति अपनी जान बचाकर देश छोड़ने में कामयाब रहें। पर 1996 में तत्कालीन राष्ट्रपति मोहम्मद नज़ीबुल्लाह ऐसा नहीं कर पाए थे और तालिबान ने उन्हें बेरहमी से मारकर अफगानिस्तान के राष्ट्रपति भवन के बाहर ट्रैफिक लाइट के एक खंभे से लटका दिया था।
एक नज़र अफगानिस्तान में सोवियत संघ से मोहम्मद नज़ीबुल्लाह के राष्ट्रपति बनने से तालिबान के हाथों बेरहमी से मारे जाने पर :-
सोवियत संघ की देख-रेख में अफगानिस्तान में शासन
साल 1980-89 तक सोवियत संघ अफगानिस्तान में रहा। सोवियत संघ की देख-रेख में ही अफगानिस्तान में शासन चला।
मोहम्मद नज़ीबुल्लाह की सरकार
1987 में पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ अफगानिस्तान (परचम) सत्ता में आई और पार्टी के मोहम्मद नज़ीबुल्लाह अफगानिस्तान ने राष्ट्रपति का पद संभाला। नज़ीबुल्लाह ने राष्ट्रपति बनने के बाद अफगानिस्तान का संविधान दुबारा लिखवाया। साथ ही अफगानिस्तान का नाम भी बदलकर रिपब्लिक ऑफ अफगानिस्तान रखा गया। नज़ीबुल्लाह की सरकार के शासन में जहां अच्छे काम हुए, वही कुछ ऐसे भी काम हुए जिसमें कई लोगों पर अत्याचार हुए। इससे अफगानिस्तान के कई लोगों में नाराज़गी थी। इससे सरकार के खिलाफ कई मुजाहिदीन भी खड़े हो गए, जिन्हें नाराज़ लोगों का सपोर्ट मिलने लगा।
सोवियत संघ का अफगानिस्तान छोड़ना
संघर्ष बढ़ा तो ऐसे हालात हो गए कि 1989 में सोवियत संघ को अफगानिस्तान छोड़ना पड़ा। हालांकि नज़ीबुल्लाह की सरकार को सोवियत संघ से मदद मिलती रही।
नज़ीबुल्लाह का राष्ट्रपति पद से इस्तीफा और यूनाइटेड नेशन्स के हेडक्वार्टर के एक कंपाउंड में छिपना
1992 में नज़ीबुल्लाह की सरकार को सोवियत संघ से मदद मिलनी बंद हो गई। ऐसे में नज़ीबुल्लाह ने राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया। साथ ही नज़ीबुल्लाह की मुश्किलें भी बढ़ गई और उन्हें अपनी जान बचाने के लिए यूनाइटेड नेशन्स के हेडक्वार्टर के एक कंपाउंड में छिपना पड़ा। वह 1996 तक इसी में छिपे रहे।
तालिबान का जन्म और अफगानिस्तान में शासन
1991 में अमेरिका और पाकिस्तान के सपोर्ट से अफगानिस्तान में तालिबान का जन्म हुआ। धीरे-धीरे तालिबान की ताकत और आतंक बढ़ने लगा। कुछ सालों में तालिबान ने धीरे-धीरे अफगानिस्तान के शहरों पर कब्ज़ा करना करना शुरू कर दिया। 1996 से 2001 तक अफगानिस्तान में तालिबान का शासन रहा।
नज़ीबुल्लाह की तालिबान के हाथों मौत
यूनाइटेड नेशन्स के हेडक्वार्टर के कंपाउंड में छिपे नज़ीबुल्लाह ने जगह-जगह से मदद की गुहार लगाई। वह अफगानिस्तान छोड़कर अपनी जान बचाने के लिए भारत में शरण लेना चाहते थे, पर ऐसा हो नहीं सका। सितंबर 1996 में तालिबान ने अफगानिस्तान की राजधानी काबुल पर कब्ज़ा करने के लिए शहर में घुसे। तालिबान ने नज़ीबुल्लाह को अपने साथ चलने के लिए कहा पर नज़ीबुल्लाह ने इसके लिए मना कर दिया। 26 सितंबर 1996 की शाम को तालिबान के सिपाहियों ने नज़ीबुल्लाह को यूनाइटेड नेशन्स के हेडक्वार्टर के कंपाउंड से उठा लिया। इसके बाद तालिबान ने उन्हें टॉर्चर किया और बेरहमी से मार दिया। इसके बाद काबुल की गालियों में ट्रक के पीछे बांधकर उनकी लाश को सड़क पर घसीटा। नज़ीबुल्लाह के भाई शाहपुर अहमदज़ई के साथ भी ऐसा ही हुआ। इसके बाद तालिबान ने दोनों की लाशों को अगले दिन अफगानिस्तान के राष्ट्रपति भवन के बाहर एक ट्रैफिक लाइट के खंभे से लटका दिया। तभी से 2001 तक अफगानिस्तान में तालिबान का शासन रहा।
नज़ीबुल्लाह की मौत पर प्रतिक्रिया
नज़ीबुल्लाह की तालिबान के हाथों बेरहमी से किए गए कत्ल की विश्व-भर में कड़ी निंदा हुई।
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Published on:
16 Aug 2021 04:15 pm
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