
Banty grover
आगरा। बंटी ग्रोवर। सरदार जी। बंटी भाई। शांति दूत। ये सभी नाम एक ही व्यक्ति के हैं। नाम है बंटी ग्रोवर। साम्प्रदायिक सौहार्द्र बनाने के लिए बंटी ग्रोवर को ही याद किया जाता है। हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध धर्म के गुरुओं को एक मंच पर लाकर अपील कराते हैं। इसका प्रभाव पड़ता है। स्थिति बिगड़ने से बच जाती है। इन धर्मगुरुओं को मांगलिक कार्यक्रमों से लेकर शोक के कार्यक्रमों तक भी ले जाया जाने लगा है, ताकि साम्प्रदायिक सद्भाव का संदेश दिया जा सके। होली मिलन हो, रोजा इफ्तार हो या ईद मिलन, सभी धर्मगुरु एक मंच पर दिखाई देते हैं। आगरा में मृत्योपरांत शोकसभा के रूप में उठावनी होती है। इनमें भी धर्मुगुरु अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। इसका श्रेय बंटी ग्रोवर को जाता है। आगरा में अकबर ने सुलहकुल की शुरुआत की थी। अकबर के नेक काम को बंटी ग्रोवर आगे बढ़ा रहे हैं। पत्रिका के विशेष कार्यक्रम Person of the Week में हमने बंटी ग्रोवर से लम्बी बातचीत की। प्रस्तुत हैं मुख्य अंशः-
पत्रिकाः सभी धर्मगुरुओं को एक मंच पर लाने का विचार कब आया?
बंटी ग्रोवरः कारगिल युद्ध के दौरान हमने गुरुद्वारा गुरु का ताल में सभी धर्मगुरुओं के साथ एक बैठक की थी। तभी से इसकी नींव पड़ गई। आगरा को तो वैसे भी सुलहकुल की नगरी कहा जाता है। सिख धर्म की नींव रखने वाले गुरु नानक देव मंदिर और मस्जिद में जाते थे। वे मक्का भी गए। उनकी मृत्यु के बाद पार्थिव शरीर पर हिन्दू और मुस्लिमों ने दावा किया। पार्थिव शरीर से चादर हटाई गई तो फूल मिले। हिन्दुओं ने सुल्तानपुर लोदी में अंतिम संस्कार किया और मुस्लिमों ने करतारपुर साहिब (पाकिस्तान) में दफनाया। प्रेरणा वहां से मिली हमें। हमारे साथ जो धर्मगुरु हैं, वे स्वयं को प्रतिनिधि कहते हैं।
पत्रिकाः आप सिख, ईसाई, हिन्दू, मुस्लिम,बौद्ध धर्म वालों के साथ लेकर चलते हैं, आपकी बात को क्यों सुनते हैं लोग?
बंटी ग्रोवरः समाजवादी पार्टी की सरकार के समय आगरा का माहौल खराब करने की कोशिश की गई। एक अखबार वाले ने मुझसे कहा कि बंटी भाई कुछ कीजिए। जब आप नेक नीयती और सत्य के मार्ग पर चलते हैं तो ऊपर वाला सुनता है। जब हमने सभी धर्मगुरुओं से अपील कराई तो सौहार्द्र बिगाड़ने वालों के मंसूबे कामयाब नहीं हो सके।
पत्रिकाः कुछ लोग कहते हैं कि ये काम प्रचार के लिए करते हैं?
बंटी ग्रोवरः हमारे साथ जो धर्मगुरु हैं, वे अपने-अपने मठ की नुमाइंदगी करते हैं। उन्हें प्रचार की क्या जरूरत है। अकबर ने आगरा से सुलहकुल शुरू किया था। आगरा के अलावा और कहां इस तरह की मिसाल मिलती है?
पत्रिकाः शांति दूत की उपाधि किसने दी?
बंटी ग्रोवरः हम काम कर रहे थे, कभी चाहना नहीं थी प्रचार की। एक अखबार ने हमारे बारे में लिखा कि इनसे सीखिए। इसके बाद संस्थाओं को पता चली। तब लीडर आगरा के सुनील जैन ने बड़े कार्यक्रम में शांति दूत की उपाधि दी। इस कार्यक्रमों में सभी धर्मगुरु, पूरन डावर, नजीर अहमद जैसी तमाम हस्तियां थीं। इसके बाद सभी संस्थाओं ने सम्मान किया। मुस्लिम संस्थाओं ने कुछ अधिक किया।
पत्रिकाः आगे भविष्य की क्या योजना है?
बंटी ग्रोवरः सब बंदे कुदरत के हैं। आपस में भेदभाव नहीं होना चाहिए।
पत्रिकाः आगरा में सांप्रदायिक सौहार्द बना रहे, इसके लिए कोई स्थायी रूप से काम कर रहे हैं क्या?
बंटी ग्रोवरः आगरा के लोगों ने इसके महत्व को समझा है। अब घरों की पूजा अर्चना में भी साम्प्रदायिक सद्भाव के लिए काम हो रहा है। पहले दो-तीन महीने में साम्प्रदायिक सद्भाव के लिए कार्यक्रम होता था, अब हर 15 दिन में हो रहा है।
पत्रिकाः आप उठावनी (शोकसभा) में भी धर्मगुरुओं को ले जाते हैं और उनसे अपील कराते हैं, इसका क्या प्रभाव पड़ता है।
बंटी ग्रोवरः हर मजहब ने भाईचारा का संदेश दिया है। श्री गुरुग्रंथ साहिब में तो सबकी वाणी है।
पत्रिकाः भविष्य में क्या करना चाहते हैं?
बंटी ग्रोवरः आगरा सुलहकुलकी नगरी है, इसमें साम्प्रदायिक सद्भाव बना रहे।
पत्रिकाः जो लोग साम्प्रदायिक सद्भाव बिगाड़ना चाहते हैं, उनके खिलाफ एक्शन की बात क्यों नहीं करते हैं?
बंटी ग्रोवरः जब हम अपनी बात रखेंगे तो साम्प्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने वालों के मंसूबे कामयाब नहीं होंगे। फिर वह अलग-थलग पड़ जाएगा और आगरा छोड़कर कहीं और जाएगा।
Published on:
04 Nov 2019 05:00 pm
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