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अब ताज महोत्सव महज एक तमाशा, वरिष्ठ कवि का दर्द आया सामने

शरदोत्सव आज ताज महोत्सव के रूप में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुका है। खेदजनक यह है कि इस आयोजन को अब महज एक तमाशा बना दिया गया।

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Taj Mahotsav

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आगरा। ताजमहल के निकट शिल्पग्राम में लगने वाला ताज महोत्सव अंतरराष्ट्रीय ख्याति का है। ताज महोत्सव को देखने के लिए लाखों लोग पहुंचते हैं। इसके साथ ही ताज महोत्सव को लेकर वरिष्ठ कवि और साहित्यकार डॉ. राजेन्द्र मिलन का दर्द सामने आया है। वे इतने क्षुब्ध हैं कि उन्होंने ताज महोसत्व को महज एक तमाशा बताया है।

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महत्व को नकारा जा रहा

डॉ. राजेन्द्र मिलने बताया कि तत्कालीन जिलाधिकारी आगरा स्व.विनोद दीक्षित ने आगरा में शरदोत्सव शुरू किया था। ब्रजमंडल के सांस्कृतिक-साहित्यिक कलाकारों के उन्नयन हेतु शुरू किया गया था। यही शरदोत्सव आज ताज महोत्सव के रूप में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुका है। खेदजनक यह है कि इस आयोजन को अब महज एक तमाशा बना दिया गया। उद्देश्य की पूर्ण उपेक्षा करके इसके महत्व को नकारा जा चुका है ।

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अनाप-शनाप पैसा बहाया जा रहा

उनका कहना है कि देश के जाने-माने कलाकारों पर अनाप-शनाप पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है। इन प्रसिद्ध फिल्मी कलाकारों और कवियों-संगीतज्ञों को अब मोबाइल पर अपनी इच्छानुसार चाहे जब देख-सुनकर मनोरंजन करना सस्ता सुलभ हो चुका है। दरअसल क्षेत्रीय वरिष्ठ कवि-कलाकार तथा हस्तकलाओं के कुशल कारीगर शिल्पी-चित्रकार आदि को दरकिनार कर दिया गया है। हँसी-खुशी, मनरंजन की अनिवार्यता को टाला नहीं जा सकता किन्तु उसके साथ मानसिक विकास और सुलभ उपादेयता भी बनी रहे, इस पर भी विचार वाँछनीय है, जो कम खर्चे में विकास के नये प्रतिमान भी स्थापित कर सकता है। क्षेत्रीय विकास ही कल राष्ट्रीय उत्थान का सोपान बने, यही मेरी मनोकामना है।

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क्या है समस्या

याद रहे कि ताज महोत्सव में स्थानीय कलाकारों के कार्यक्रम तो होते हैं, लेकिन उन्हें भुगतान के नाम पर कुछ नहीं दिया जाता है। सदर बाजार और नूरजहां प्रेक्षागृह (शिल्पग्राम) में नवोदित कलाकारों के कार्यक्रम किए जाते हैं। कवि सम्मेलन में नामी-गिरामी कवि और शायरों को बुलाया जाता है। बृज के कवियों को पूछा तक नहीं जाता है। इस पर पहले भी बहुत मंथन हो चुका है, लेकिन हर अधिकारी अपनी इच्छानुसार कार्यक्रमों को अंतिम रूप देता है। दो घंटा कार्यक्रम प्रस्तुत करने के लिए कलाकार लाखों रुपये लेते हैं और इसके लिए आगरा के व्यापारियों से चंदा वसूला जाता है। पुलिस और प्रशासन के कहने पर चंदा देना ही होता है। इसके बाद भी इन्हें सुनने के लिए लोग नहीं पहुंचते हैं। इसी कारण डॉ. राजेन्द्र मिलन की पीड़ा सामने आई है।

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