
आगरा। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी दो दिन की पड़ने पर लोग भ्रमित हो जाते हैं। जन्माष्टमी को मनाने वाले दो समुदाय अलग अलग तिथियों में श्रीकृष्ण का प्राकट्योत्सव मनाते हैं। स्मार्त सम्प्रदाय दो सितम्बर को जन्माष्टमी मनाएगा, जबकि वैष्णव सम्प्रदाय तीन सितम्बर को प्राकट्योत्सव मनाएगा। इन दोनों सम्प्रदाय के रीति रिवाजों में अंतर और इन सम्प्रदायों के बारे में अधिक जानकारी के लिए बात की वैदिक सूत्रम चेयरमैन भविष्यवक्ता पंडित प्रमोद गौतम से। उन्होंने स्मार्त सम्प्रदाय और वैष्णव सम्प्रदाय के अंतर के सन्दर्भ में बताते हुए कहा कि वैदिक शास्त्रों में कहा गया है कि जो व्यक्ति श्रुति स्मृति में विश्वास रखता है। पंचदेव अर्थात ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गणेश, उमा को मानता है, वह स्मार्त हैं। प्राचीनकाल में अलग-अलग देवता को मानने वाले संप्रदाय अलग-अलग थे। श्री आदिशंकराचार्य द्वारा यह प्रतिपादित किया गया कि सभी देवता ब्रह्मस्वरूप हैं। जन साधारण ने उनके द्वारा बतलाए गए मार्ग को अंगीकार कर लिया और स्मार्त कहलाए।
वैष्णव सम्प्रदाय के गुरु से दीक्षा
पंडित प्रमोद गौतम ने बताया कि जो किसी वैष्णव सम्प्रदाय के गुरु या धर्माचार्य से विधिवत दीक्षा लेता है और गुरु से कंठी या तुलसी माला गले में ग्रहण करता है या तप्त मुद्रा से शंख चक्र का निशान गुदवाता है। ऐसे व्यक्ति ही वैष्णव कहे जा जाते हैं। अर्थात वैष्णव को सीधे शब्दों में कहें तो गृहस्थ से दूर रहने वाले लोग।
स्मार्त सम्प्रदाय क्या है
वैदिक सूत्रम चेयरमैन भविष्यवक्ता पंडित प्रमोद गौतम ने बताया कि स्मार्त सम्प्रदाय 'द्विज' या 'दीक्षित' उच्च वर्ग के सदस्यों वाला एक हिन्दू धार्मिक सामाजिक सम्प्रदाय है। इसके सदस्यों में मुख्य रूप से ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्गों के लोग शामिल हैं। इस सम्प्रदाय में मूलत: ब्राह्मण अनुयायियों की विशेषता हिन्दू देवगण के सभी देवताओं की भक्ति और प्राचीन सूत्र पाठों में निर्दिष्ट अनुष्ठान एवं आचार के नियमों का पालन करना है। वे अपने देवता या पूजन-पद्धति के बारे में एकनिष्ठ नहीं हैं।
स्मृति शब्द से निकला
पंडित प्रमोद गौतम ने बताया कि स्मार्त नाम संस्कृत शब्द 'स्मृति' से निकला है। जिसे वेदों के विपरीत मानव द्वारा लिखित प्राचीन मूलपाठ माना जाता है। वेदों के विषय में मान्यता है कि उन्हें आध्यात्मिक संतों, ऋषियों को देववाणी द्वारा उद्घाटित किया गया। स्मार्त सम्प्रदाय स्मृति साहित्य का अनुसरण करता है। उनके महानतम गुरु और कुछ लोगों के अनुसार धार्मिक-सामाजिक समूह का निर्माण करने वाले, आठवीं सदी के दार्शनिक व अद्वैत वेदान्त के प्रतिपादक शंकर इस आन्दोलन के संस्थापक थे। श्रृंगेरी, कर्नाटक में उनके द्वारा स्थापित मठ स्मार्त सम्प्रदाय का केन्द्र बना हुआ है। इस मठ के प्रमुख जगदगुरु, दक्षिण भारत एवं गुजरात में स्मार्तों के आध्यात्मिक गुरु हैं व भारत के प्रमुख धार्मिक व्यक्तित्वों में एक हैं। वैदिक सूत्रम के चेयरमैन पंडित प्रमोद गौतम ने बताया कि वेदों को श्रुति ग्रंथ कहा जाता है अर्थात जिस ज्ञान को परमेश्वर से सुनकर जाना गया। वेदों को छोड़कर सभी ग्रंथ स्मृति ग्रंथ कहलाते हैं। जिस ज्ञान को परम्परा के माध्यम से जाना या जिसे स्मृतियों के आधार पर जाना। अधिकतर लोग इस संप्रदाय का नाम शंकराचार्य से जोड़ते हैं। शंकराचार्य ने तो दसनामी संप्रदाय की स्थापना की थी, जो सभी शिव के उपासक शैव पंथ से हैं।
अधिकतर हिंदू स्मार्त सम्प्रदाय के
पंडित प्रमोद गौतम ने बताया कि स्मार्तों के धर्मग्रंथ सभी पुराण, स्मृतियां हैं। स्मृति ग्रंथों में मनु स्मृति सहित सभी स्मृतियां और पुराण आते हैं। वेदों को छोड़कर जो इन ग्रंथों पर आधारित जीवन-यापन करते हैं उनको स्मार्त संप्रदाय का माना जाता है। जैसे जो विष्णु को भी माने और शिव को भी, दुर्गा को भी और अन्य देवी-देवताओं का भी पूजन करें। वे सभी स्मार्त संप्रदाय के हैं। अधिकतर हिन्दू स्मार्त सम्प्रदाय के ही हैं जिसमें एकनिष्ठता का अभाव है।
दक्षिण और गुजरात
वैदिक सूत्रम चेयरमैन पंडित प्रमोद गौतम ने बताया कि उत्तर के स्मार्त दक्षिण एवं गुजरात के अपने प्रतिरूपों से इन अर्थों में कुछ अलग हैं कि इस नाम का मतलब अनिवार्य रूप से शंकर का अनुयायी होना नहीं है। उत्तर में शुद्ध स्मार्त मन्दिर भी दक्षिण की अपेक्षा कम हैं। स्मार्त अन्य देवताओं के बजाए एक देवता को प्राथमिकता दे सकते हैं और आजकल उनमें शिव अत्यधिक लोकप्रिय हैं। लेकिन, वे अपनी उपासना में पांच मुख्य देवताओं-शिव, विष्णु, शक्ति (उनके दुर्गा, गौरी, लक्ष्मी, सरस्वती जैसे सभी रूपों सहित) सूर्य एवं गणेश की पंचायतन पूजा करते हैं। इस प्रकार स्मार्त सम्प्रदाय सभी मूल पांचों सम्प्रदायों, शैव, वैष्णव, शाक्त, सौर और गाणपत्य के मूल देवताओं को मिलाकर एक साथ उनकी पूजा करता है। यह किसी एक सम्प्रदाय से न जुड़कर उनकी सम्मिलित शक्ति की आराधना करता है और खुद को सबसे जोड़ लेता है। यह शैव भी है, शाक्त भी है, सौर भी है, वैष्णव भी है और गाणपत्य भी है |
सभी शाखाओं में सक्रिय
पंडित प्रमोद गौतम ने बताया कि स्मार्त ब्राह्मण, हिन्दू धर्म के सार्वभौमिक मूल्यों को प्राथमिकता देते हैं। वे शिक्षा की सभी शाखाओं में सक्रिय हैं। तमिल में 'अय्यर' उपनाम की उपाधि अक्सर उनके नाम के आगे लगाई जाती है, जो अब कुलनाम बन गया है। स्मार्त सभी सम्प्रदायों के बीच संतुलन बनाते हुए सामाजिक संरचना के अनुसार दैवीय आराधना को समायोजित करते हुए सामाजिक, पारंपरिक, नैतिक मूल्यों को बचाए रखने में तत्पर रहते हैं। सामान्यजन में अधिकतर स्मार्त सम्प्रदाय के लोग ही रहते हैं।
विष्णु को परमेश्वर मानते हैं वैष्णव
पंडित प्रमोद गौतम ने बताया कि इस तरह वेद और पुराणों से उत्पन्न 5 तरह के संप्रदायों माने जा सकते हैं। 1. वैष्णव, 2. शैव, 3. शाक्त, 4 स्मार्त और 5. वैदिक संप्रदाय। वैष्णव जो विष्णु को ही परमेश्वर मानते हैं, शैव जो शिव को परमेश्वर ही मानते हैं, शाक्त जो देवी को ही परमशक्ति मानते हैं और स्मार्त जो परमेश्वर के विभिन्न रूपों को एक ही समान मानते हैं। अंत में वे लोग जो ब्रह्म को निराकार रूप जानकर उसे ही सर्वोपरि मानते हैं। हालांकि सभी संप्रदाय का धर्मग्रंथ वेद ही है। सभी संप्रदाय वैदिक धर्म के अंतर्गत ही आते हैं।
Updated on:
30 Aug 2018 12:44 pm
Published on:
30 Aug 2018 10:46 am
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