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पति के निधन के बाद बच्चों को मजदूरी करके पढ़ाया, बेटे ने हासिल की सरकारी नौकरी, रुला देगी ये 4 संघर्ष की कहानियां

Inspirational Story: बीड़ी बनाने के लिए कच्चा माल फर्म से ही उपलब्ध कराया जाता है। ये महिलाएं अपने हौसले से परिवार के लिए संबल बन रही हैं।

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labour day 2026

फोटो: पत्रिका

International Labor Day 2026: सुबह की पहली किरण के साथ ही घर के एक कोने में चुपचाप बैठी महिलाएं तेंदू पत्तों और तंबाकू के बीच दिन की शुरुआत करती हैं। उंगलियां लगातार चलती रहती हैं, आंखें थकती हैं, लेकिन जिम्मेदारियों का बोझ उन्हें रुकने नहीं देता।

शहर में सैकड़ों महिलाएं बीड़ी बनाकर जीविका चला रही हैं। दिनभर की मेहनत के बाद वे बीड़ी फर्म को सौंपती हैं और बदले में मिलने वाले मेहनताने से घर का चूल्हा जलता है। बीड़ी बनाने के लिए कच्चा माल फर्म से ही उपलब्ध कराया जाता है। ये महिलाएं अपने हौसले से परिवार के लिए संबल बन रही हैं। अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस पर इनके संघर्ष की कहानी :

बीड़ी की कमाई से गढ़ा बच्चों का भविष्य

58 वर्षीय इंदिरा देवी का जीवन संघर्ष की मिसाल है। पति गोविंद सिंह राठौड़ का 18 साल पहले निधन हो गया। चार संतान अभिषेक, दर्शन, खुशबू व गरिमा की जिम्मेदारी उन पर आ गई। उन्होंने इसे बखूबी निभाया। वे रोजाना करीब 1500 बीड़ी बनाकर 250 रुपए कमाती हैं। सीमित आय से बच्चों को शिक्षा दिलाई। बेटा अभिषेक रेलवे लोको कारखाने में तकनीशियन ग्रेड-वन के पद कार्यरत है। दो बेटियों दर्शन व खुशबू की शादी की जिम्मेदारी भी उठा चुकी हैं।

सरोज के संघर्ष ने संवारा परिवार

शंकरनगर निवासी 70 वर्षीय सरोज देवी बचपन से बीड़ी बनाने का काम कर रही हैं। रोजाना करीब 1000 बीड़ी बनाने पर 170 रुपए मिलते हैं, जिनसे घर खर्च चलता है। वे बताती हैं ‘करीब 60 साल से बीड़ी बना रही हूं। कभी 10 रुपए में 1000 बीड़ी भी बनाई थीं।’ 25 साल की उम्र में पुत्र विजय की बीमारी से मृत्यु हो गई। एक बेटी की भी असमय मौत हो चुकी है। बाकी तीन बेटियां विवाहित हैं। सरोज के पति सूरज (75) ब्रास बैंड में काम करते थे। वे बताते हैं ‘शादी समारोह में 500 रुपए प्रतिदिन मिलते थे। पत्नी के बीड़ी बनाने से घर चलाने में सहारा मिला है।

विद्या बनी परिवार की ‘ताकत’

गूजर धरती सेवा टाटूडा की लेन की 60 वर्षीय विद्या ने बचपन में पीहर गौतमनगर में बीड़ी बनाना शुरू किया और आज भी यह काम जारी है। पति निरंजन को पिछले 15 साल से सांस की बीमारी है और चार स्टंट डल चुके हैं, जिनका इलाज पूरी तरह से विद्या के कंधों पर है। घर के कामों के साथ विद्या दिनभर में 500-600 बीड़ी बना पाती हैं, जिनसे उन्हें 80-90 रुपए तक की आमदनी होती है। इस सीमित आमदनी से उन्होंने बेटी का विवाह भी किया। विद्या कहती हैं, ‘जीवन की मुश्किलों से लड़ते हुए घर की जिम्मेदारियां निभाना ही हमारा लक्ष्य है।’

परिवार को संबल दे रहा हीरा देवी का हौसला

65 वर्षीय हीरा देवी ने जीवनभर बीड़ी बनाकर परिवार का भरण पोषण किया है। दिन में 500 से 700 बीड़ी बनाकर 90-100 रुपए कमाने वाली हीरा देवी का जीवन अब और भी कठिन हो गया है। उनकी बेटी ज्योति को चिकित्सकों ने ब्रेस्ट कैंसर बताया है। इलाज में उन्होंने 50-60 हजार रुपए खर्च कर दिए हैं। 13 साल पहले पति का निधन हो चुका, फिर भी घर के काम, बेटी की देखभाल और बीड़ी बनाने के संघर्ष में कोई कमी नहीं आई।