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केवल तीन महीने के लिए मिला कुलपति, नौ महीने रहे भगवान भरोसे

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mds university vice chancellor

mds university vice chancellor

अजमेर.

साल 2018 महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय के लिए अच्छा साबित नहीं हुआ। पूरे साल विश्वविद्यालय परेशान ही रहा। विश्वविद्यालय के सबसे बड़े मुखिया की कुर्सी साल के शुरुआत से अंत तक ‘खाली ’ ही पड़ी है। कुलपति होते हुए भी विश्वविद्यालय को कोई फायदा नहीं है। अब नए साल 2019 में ही भला होने की उम्मीद है।

विश्वविद्यालय पूरे साल ही परेशानी में रहा। यहां कुलपति सबसे सर्वोच्च पद होता है। शैक्षिक के अलावा अहम वित्तीय और प्रशासनिक मामलों में कुलपति ही फैसला लेते हैं। यहां साल 2018 के शुरुआत से कुलपति पद पर ग्रहण लगा हुआ है। बीती 1 जनवरी से 19 अप्रेल तक बीकानेर के महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. भगीरथ सिंह के पास इस विश्वविद्यालय का अतिरिक्त कार्यभार रहा। 20 अप्रेल को प्रो. विजय श्रीमाली स्थाई कुलपति नियुक्त हुए। दुर्भाग्य से 20 जुलाई को उनका देहांत हो गया।

पहली बार खाली रहा पद
कायदे से प्रदेश के किसी विश्वविद्यालय में कुलपति पद कभी खाली नहीं रहता है। स्थाई कुलपति पद पर रिक्त होने पर राज्यपाल और सरकार पूर्व में संभागीय आयुक्त को कार्यभार सौंपती थी। 2017 में विधानसभा ने एक्ट में बदलाव किया। इसके तहत अब किसी अन्य विश्वविद्यालय के स्थाई कुलपति को ही अतिरिक्त जिम्मेदारी दी जाती है। लेकिन 31 साल में इतिहास में पहली बार महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय में कुलपति पद खाली रहा। यहां 21 जुलाई से 9 अगस्त तक तत्कालीन सरकार और कुलाधिपति ने यहां कुलपति की नियुक्त नहीं की। 10 अगस्त से 5 अक्टूबर तक बांसवाड़ा के गोविंद गुरु जनजातीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. कैलाश सोडाणी के पास जिम्मेदारी रही।

11 अक्टूबर से बढ़ी मुसीबत...
कुलाधिपति और राज्यपाल कल्याण सिंह ने बीती 6 अक्टूबर को प्रो. आर. पी. सिंह को कुलपति बनाया। वे महज पांच दिन काम कर सके। 11 अक्टूबर को लक्ष्मीनारायण बैरवा की जनहित याचिका पर राजस्थान हाईकोर्ट ने कुलपति प्रो. सिंह के कामकाज करने पर रोक लगा दी। छह सुनवाई के बाद भी हाईकोर्ट ने रोक जनवरी तक जारी रखी है।

कुलपति पद को बनाया मजाक
सरकार और राजभवन ने कुलपति पद को मजाक बना दिया है। प्राचीन गुरुकुल पद्धति और आधुनिक विश्वविद्यालयों में भी 90 के दशक तक कुलपति पद को गरिमापूर्ण समझा जाता रहा। प्रदेश में तो कई बार राज्यपाल अवकाश पर जाने से पहले राजस्थान विश्वविद्यालय के कुलपति को कार्यभार सौंपकर जाते थे। लेकिन पिछले बीस साल में कुलपति पद ‘सियासी’ बन गया है। इसका खामियाजा महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय भुगत रहा है।