
तारीख: 29 जनवरी, समय: दोपहर के 12 बजे, जगह: नैनी केबल ब्रिज चौराहा। प्रयागराज शहर से बाहर निकलने के बाद हम मेजा रोड जाने वाली सड़क की तरफ मुड़े। मुड़ते ही सबसे पहले हमें सड़क के साइन बोर्ड पर लगे करीब 30*3 फिट साइज का भगवा रंग का बैनर दिखा।
बैनर के ऊपरी हिस्से के सेंटर में लिखा था ‘मां शीतला कृपा महोत्सव 2023।’ उसके नीचे लिखा था ‘DGS परिवार और लास्ट लाइन में लिखा था, आप सभी भक्तजनों का हार्दिक स्वागत करता है।’
बाएं तरफ बागेश्वर धाम के बाबा पंडित धीरेंद्र शास्त्री का बड़ा फोटो था। फोटो के नीचे लिखा था बागेश्वर धाम का दिव्य दरबार। नाम के नीचे उनके 2 फरवरी को दोपहर 12 बजे से 3 बजे तक प्रयागराज के मेजा तहसील में पड़ने वाले कुंवर पट्टी गांव में आने की जानकारी लिखी थी।
बैनर में दाहिने तरफ कार्यक्रम के संयोजक इंद्रदेव शुक्ला उर्फ राजू भैया का फोटो लगा था। फोटो के नीचे उनका नाम और नाम के नीचे ‘जनसेवक’ लिखा था।
नैनी ब्रिज चौराहे पर लगे इसी बैनर से हमें बागेश्वर धाम वाले बाबा के प्रयागराज आने कि पहली बार पब्लिकली जानकारी दिखी। प्रयागराज के टूरिस्ट स्पॉट्स में से एक नैनी केबल ब्रिज को साल 2004 में बनाया गया था।
इसको बनवाने में तत्कालीन सांसद डॉ. मुरली मनोहर जोशी का शानदार योगदान था। प्रयागराज से यमुनापार के जिलों में जाने के लिए यह सबसे हाईटेक पुल है।
हमें बागेश्वर धाम वाले बाबा पंडित धीरेंद्र शास्त्री के प्रयागराज में लगने वाले दिव्य दरबार को कवर करना था। अन्धविश्वास को बढ़ावा देने वाली आलोचनाओं से घिरे पंडित धीरेंद्र शास्त्री, तमाम कंट्रोवर्सीज के बीच पहली बार यूपी आ रहे थे।
उनके कार्यक्रम से 5 दिन पहले शहर से 70 किलोमीटर दूर हम उसी कुंवरपट्टी गांव पहुंचे जहां वो आने वाले थे। हमें रास्ते में पड़ने वाले हर चौराहे और बड़े साइन बोर्ड पर वही बैनर दिखा जो हमने सबसे पहले नैनी ब्रिज चौराहे पर देखा था।
करीब 2 घंटे के जर्नी के बाद हम दोपहर 2 बजे गांव पहुंचे। हमने गांव के लोगों, क्षेत्र के लोगों, आयोजकों, प्रशासन के लोगों और दिव्य दरबार के अनुयायियों से बातें की। आइए उन्हीं कहानियों में उतरते हैं…
कहानी अब उस कुंवर पट्टी गांव से, जहां लगने वाला था बाबा का दिव्य दरबार
गांव पहुंचने के बाद हमने सबसे पहले एक 55 साल के चाचा से 3 सवाल पूछे। पहला: दिव्य दरबार के बारे में। दूसरा: आयोजक का पता और तीसरा: क्षेत्र में माहौल क्या है?
चाचा ने तीनों सवालों के जवाबों का उत्तर एक ही में देते हुए बताया कि बागेश्वर धाम वाले बाबा पंडित जी आ रहे हैं। करीब एक से डेढ़ लाख लोगों के आने की उम्मीद है। पूरे इलाके में माहौल बिल्कुल भक्तिमय हो चुका है और इद्रदेव शुक्ला के घर के तरफ इशारा करते हुए बताया कि वही उनका घर ‘सोना भवन’ है।
कच्चे-पक्के रास्तों से होते हुए जब हम सोना भवन में दाखिल हुए तो द्वार पर बने शीतला माता के मंदिर में पूजा-अर्चना चल रही थी। वहां तकरीबन तीन सौ से ज्यादा लोग थे। भीड़ थी। चहल-पहल के बीच मंदिर में पढ़े जा रहे मंत्रों की आवाजें साफ-साफ सुनाई नहीं दे रहीं थी। लेकिन, बीच- बीच में बड़े से घंटे के बजने से आती ‘टन-टन’ की आवाजें लोगों के मन के कौतुहल को ब्रेक करके उनके अंदर भक्ति प्रवाहित कर रहीं थी।
द्वार पर खड़ी 3 लग्जरी गाड़ियां सोना भवन की शोभा बढ़ा रहीं थीं। जिसमें से एक महाराष्ट्र नंबर कि ऑडी कार, दूसरी प्रयागराज नंबर कि फार्चूनर और तीसरी सेडान कार थी। तीनों गाड़ियां सफेद रंग की थीं। सौ से ज्यादा लोग भगवा कुर्ता और सफेद पायजामा यानी एक ही तरह के ड्रेस पहने हुए थे। वो हर आने-जाने वाले लोगों के आवभगत और पूजा-पाठ के व्यवस्था में लगे हुए थे।
पहुंचते ही हमें सबसे पहले आयोजक इंद्रदेव शुक्ल मिले उन्होंने हमारा परिचय पूछा और सामान्य शिष्टाचार के तहत आवभगत की पेशकश की। इंट्रोडक्शन के बाद हमने उनसे 10 मिनट तक कार्यक्रम और बागेश्वर धाम के बाबा धीरेंद्र शास्त्री से जुड़े सवाल-जवाब किए। जैसे- कार्यक्रम के अनुमति, उनको, इस समय में उनको यहां बुलाने का क्या मोटिव है? कितने पैसे लिए इत्यादि।
उन्होंने जवाब देते हुए बताया कि परमिशन मिल चुकी है। हम हर साल मां शीतला का पूजा-अनुष्ठान कराते हैं। इसी क्रम में इस बार बाबा को बुलाया गया है। पैसे लेने-देने के सवाल पर उन्होंने कहा कि वो पैसे नहीं लेते हैं। उनका जहां इच्छा हुआ वो वहां अपना दिव्य दरबार लगाएंगे।
तकरीबन डेढ़ घंटे बातचीत करने के बाद हम दिव्य दरबार लगने वाली जगह को देखने पहुंचे…
समय: शाम के 4 बजे, जगह: गांव से 300 मीटर बाहर मेन रोड की तरफ। कार्यक्रम स्थल पर पहुंचने के बाद हमने देखा कि खेत में लगभग 15 फीट ऊंची पक्की बॉउंड्री बनाई जा रही थी।
100 से ज्यादा की संख्या में मजदुर काम में लगे थे। करीब 50 दीवाल जोड़ रहे थे बाकी टेंट लगाने और मिट्टी डालकर रास्ते में पड़ने वाले गड्ढे को भर रहे थे।
हमने सबसे बात की और पूछा कि आप लोग कितने की संख्या में हैं? कितने दिन से काम कर रहे हैं? और कार्यक्रम स्थल की लंबाई चौड़ाई कितनी है। वर्कर्स ने बताया कि वो कुल 200 की संख्या में हैं और 15 दिनों से लगातार दो शिफ्ट में काम कर रहे हैं।
कार्यक्रम स्थल 700 फिट लंबा और 100 फिट चौड़ा है। जबकि स्टेज की लम्बाई-चौड़ाई 60*30 है। हमने वहां मौजूद गांव के दूसरे लोगों से बातें की और अपने चैनल के फेसबुक लाइव के माध्यम से दर्शकों को दिखाया भी।
कवरेज का दूसरा दिन
तारीख: 30 जनवरी, जगह: माघ मेला, प्रयागराज। कवरेज के दूसरे दिन हम प्रयागराज के संगम के किनारे लगने वाले माघ मेले में पहुंचे। संगम नोज पर युवाओं से, मेले में सतुआ बाबा आश्रम के भक्तों से, पब्लिक से और धुनी रमाने वाले साधुओं से बातें की।
संगम के किनारे गाजीपुर के आकाश वर्मा, निखिल वर्मा और कृष्णा वर्मा मिले। आकाश और निखिल इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में सेकंड इयर एंड थर्ड इयर के स्टूडेंट हैं जबकि कृष्णा SSC यानी स्टाफ सलेक्शन कमीशन की कोचिंग करते हैं। निखिल ने बताया कि उनकी बागेश्वर धाम के बाबा पंडित धीरेन्द्र शास्त्री में आस्था है, विश्वाश है और उनको देखना और मिलना चाहते हैं।
आकाश वर्मा कहते हैं कि धीरेंद्र शास्त्री सनातन धर्म का झंडा लेकर हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए निकल पड़े हैं। उनके इस जर्नी में हम उनको समर्थन करते हैं। और पूरी तरह से साथ हैं।
संगम किनारे यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट्स से बात करने के बाद हम सतुआ बाबा के आश्रम पहुंचे। पूरे माघ मेले में सबसे ज्यादा भीड़ इसी आश्रम में थी। पंडाल लोगों से खचा-खच भरा हुआ था। हजारों लोग बाहर हाथ जोड़कर सड़क पर बैठे थे।
उनसे पूछा कि आप लोग कितनी देर से बैठे हैं? कहां से आये हैं? जवाब मिला कोई बिहार से आया था तो कोई राजस्थान, मध्य प्रदेश और यूपी के अलग-अलग जिलों से। 2 से 4 घंटे तक लोग सड़क पर बैठकर इसी उम्मीद में बैठे थे कि उनकी बारी आने पर उनको आश्रम में एंट्री मिल जाएगी।
सोशल मीडिया ने बागेश्वर धाम वाले बाबा को घर-घर तक पहुंचाया
माघ मेले और सतुआ बाबा आश्रम में मौजूद हमने करीब 200 लोगों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तरीके से बागेश्वर धाम सरकार और पंडित धीरेंद्रकृष्ण शास्त्री के बारे में पूछा।
आंकड़ें के अनुसार 85%-90% लोगों ने कहा कि वो उनको जानते हैं। पंडित धीरेंद्र शास्त्री को पहचान दिलाने में सबसे बड़ी भूमिका सोशल मीडिया की रही है। इसपर मुहर उन लोगों ने लगाई, जिनसे हमने उनके बारे में पूछा। करीब 90% लोग उनको सोशल मीडिया जैसे- इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब के माध्यम से जानते हैं।
सतुआ बाबा आश्रम के बाद हम धुनी रमा रहे एक नागा साधु के कुटिया में गए। अर्धनग्न अवस्था में सोफे पर बैठे बाबाजी। सोफे के सामने एक 4 *3 के साइज के कुंड में अग्नि जल रही थी। कुटिया में लाल.पीली नीली, रंग-बिरंगी लाईटें जल रहीं थीं।
पास में बैठे 6 भक्त चिलम में गांजा भर रहे थे। हम बाबा के नजदीक जमीन पर बैठे। उन्होंने, कुंड के भभूत से हमें तिलक लगाया। हमारे बारे में पूछा, हमने अपना परिचय देते हुए उनसे कुछ सवाल करने की इजाजत मांगी। उन्होंने हां में सर हिलाते हुए हमें सवाल पूछने के लिए सहमति दी।
चिलम में गांजा भर रहे भक्तों ने प्रसाद बताकर उसके कश को लेना शुरू कर दिया था। बारी- बारी से सभी एक-एक कश ले रहे थे।
हमने उनसे उनका नाम पूछा? वो किस अखाड़े से हैं? और पंडित धीरेंद्र शास्त्री को जानते हैं ? यदि हां तो उनके साथ चल रहे कंट्रोवर्सी को किस तरह से देखते हैं?
वो कुछ देर सोचते रहे फिर उन्होंने बताया कि उनका नाम महंत श्री मुन्ना गिरी है और वो पंच दश नाम जूना अखाड़े से हैं। धीरेंद्र शास्त्री के बारे में उन्होंने कहा कि वो हिंदू धर्म का झंडा बुलंद किए हुए हैं। उनको अपना काम करते रहने चाहिए। सबकी अपनी आस्था और विश्वास का मामला है।
हमसे सवाल पूछने के लहजे में उन्होंने कहा कि वो जबरदस्ती तो किसी को बुलाते नहीं हैं न।
मेले, अध्यात्म और उनके जर्नी पर बात करने के बाद हमने उनसे विदा लिया।
कवरेज का तीसरा दिन
भोजपुरी जगत के सितारों से सजने वाला था कुंवर पट्टी गांव
तारीख: 31 जनवरी, समय: दोपहर के 1 बजे, जगह: प्रयागराज का कुंवर पट्टी गांव।
इस दिन हम प्रयागराज से करीब 11 बजे कुंवर पट्टी गांव के लिए निकले। 2 घंटे में हम गांव पहुंचे। 2 दिन पहले से स्थिति अब काफी बदल चुकी थी। सोना भवन यानी जहां बागेश्वर धाम के मुखिया को आना था, उसको दुल्हन की तरह सजाया गया था।
शीतला माता के मंदिर को गेंदे, गुलाब और कई तरह के फूलों से सजाया गया था। द्वार पर आज चहल-पहल भी दो दिन पहले से ज्यादा थी। 31 जनवरी का दिन कुंवर पट्टी गांव के लिए बड़ा होने वाला था। शीतला माता महोत्सव में आज भोजपुरी इंडस्ट्री के तीन बड़े कलाकार आ रहे थे। 1. मनोज तिवारी 2. दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ 3. कल्पना पटवारी। जहां दरबार लगना था उस पंडाल को भी करीब 70% तैयार कर दिया गए था।
दिन ढला और शाम हुई, ठंड ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया। लोग द्वार पर जल रहे अलाव के पास, बस बैठ जाना चाहते थे। सूर्यास्त के आधे घंटे के बाद, बाहर बगीचे में लगे स्टेज से ‘हैलो चेक’ माइक टेस्टिंग की आवाज से सबके मन में चल रहे विचार मुड़कर आवाज की दिशा की तरफ मूड जाती है।
तब तक दूसरी आवाज आती है कि ‘शीतला महोत्सव में आए सभी भक्तजनों का शुक्ला परिवार हार्दिक स्वागत एवं अभिनंदन करता है।’ कौतूहल वश लोग अलाव के पास से उठकर स्टेज की तरफ चले जाते हैं। तब तक तबला, ढोलक और संगीत वाद्य यंत्रों के टेस्टिंग की आवाजें एक-एक करके सुनाई देने लगती हैं।
इसके बाद हमने शुक्ला भाईयों में दूसरे नंबर के भाई ब्रम्हदत्त शुक्ला का फेसबुक लाइव के माध्यम से इंटरव्यू लिया और उनसे कार्यक्रम और परिवार के राजनीतिक महत्वकांछाओं के बारे में बातें की।
उन्होंने एक-एक कर के हमारे सभी सवालों के जवाब भी दिए। नीचे वीडियो पर क्लिक करके आप उस इंटरव्यू को देख सकते हैं।
समय: रात के 8 बजे, बच्चों की भीड़ स्टेज में इकट्ठा हो रही थी। उनमें से बहुतों को मनोज तिवारी और निरहुआ के बारे में पता नहीं था। लेकिन, DJ में बज रहा भक्ति गाना ‘बम-बम बोल रहा है काशी’ पर उनके पैर थिरक रहे थे।
2 घंटे और बीत जाने के बाद रात के करीब 10 बजे द्वार पर अचानक से हलचल बढ़ी। कौतुहलवस जब तक हम किसी से पूछते, तब तक भीड़ को चीरते हुए एक जोर की आवाज आती है ‘अरे,मनोज तिवारी और निरहुआ आ गए हैं।’ हम भी वहां पहुंचे।
आते ही दोनों सोना भवन में चले गए। कपड़े बदलकर वो 15-20 मिनट के बाद मंदिर में दर्शन के लिए पहुंचे। निरहुआ यूपी के आजमगढ़ से सांसद हैं तो मनोज तिवारी उत्तर-पूर्वी दिल्ली से सांसद हैं।
इशारों-इशारों में स्वामी प्रसाद मौर्या को बताया ‘राछस’
दर्शन के बाद उन्होंने हमसे यानी मीडिया से बातें कि हमने उनसे एक-एक करके धीरेंद्र शास्त्री के ऐसे टाइम में यहां आने को लेकर सवाल पूछे। उनके आने से क्या बीजेपी को साल 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव में पॉलिटिकल माइलेज नहीं मिलेगा के सवालों का उन्होंने डिटेल में उत्तर दिया। आप उसको नीचे वीडियो में देख सकते हैं।
मीडिया से बातचीत के बाद दोनों नेता और अभिनेता ने मंच पर पहुंच कर भक्ति भक्ति गाने गाए। उनकी आवाजों पर पंडाल में बैठे लोग नाचने पर मजबूर हो गए। 1 घंटे बाद तकरीबन 11 बजे कल्पना पटवारी भी मंच पर पहुंचीं। कार्यक्रम कुल 3 घंटे चला। रात के करीब 1 बज चुके थे आयोजक ने कार्यक्रम के समाप्त करने की घोषणा की और सभी अपने अपने घर चले गए।
कवरेज का चौथा दिन
भीड़ जुटना शुरू हो चुकी थी, राजस्थान से लेकर झारखण्ड तक से आ रहे थे श्रद्धालु
हम गांव के बाहर मेन रोड पर बने एक गेस्ट हाउस में रुके हुए थे। कवरेज की गई स्टोरी को छपने के लिए भेजने के बाद। शाम के तकरीबन 3 बजे हम कमरे से बाहर आए। सुबह तक खाली पड़ी सड़कें अब लोगों के आने जाने के कारण बिजी हो गई थी। गाड़ियों की संख्या भी बढ़ गयी थी। किसी मेले जैसा पूरा माहौल लग रहा था।
हम नीचे गए और उनसे बातें कीं। एक-एक करके हमने उनसे पूछा? वो कहां से आये हैं? उनकी कितनी आस्था है? उन्होंने इनके बारे में कहां से सुना था? इससे पहले क्या वो कभी दिव्य दरबार में शामिल हुए हैं या नहीं? क्या पैसे लगते हैं पर्ची बनवाने के?
सभी ने एक-एक करके जवाब देते हुए बताया कि कोई झारखण्ड से आया है तो कोई मध्य प्रदेश और राजस्थान से। यूपी के कई जिलों से लोग आए थे। सोशल मीडिया से उनको बागेश्वर धाम सरकार के बारे में पता चला। कुछ लोग पहले उनके अनेक जगह लगे कार्यक्रमों में गए थे लेकिन, नहीं जाने वालों की संख्या उनसे कहीं बहुत अधिक थी।
कार्यक्रम का पांचवां और फाइनल डे
गंगा यमुना और सरस्वती का ही नहीं बल्कि आस्था, विश्वास और उम्मीद का भी संगम बना प्रयागराज
तारीख: 1 फरवरी, समय: रात के 1 बजे, जगह: कुंवर पट्टी गांव का गेस्ट हाउस। रात के12 बजते ही घड़ी के कैलेंडर में समय के साथ तारीख भी बदली। सुबह हमारे लिए कवरेज का सबसे अहम् और जरुरी दिन था। एक तरह से यह किसी फाइनल मैच की तरह था।
पांच दिनों से लगातार इसपर कवरेज करते, गांव और आस-पास के क्षेत्रों में लगातार जाने से लोग मानने लगे थे। सम्मान करते थे। बातों को बड़े ही गौर से सुनते थे। बड़े चाव से अपनी बातें सुनाते भी थे।
हमें पता था कि कल सुबह से लेकर शाम तक लगातार खबर पर बने रहना है। अपने साथी के साथ हम इसपर चर्चा करते, प्लान बनाते। रात के करीब एक बज रहे होंगे। रात के शांति में कुछ लोगों की बातों ने साइलेंस को ब्रेक किया।
बाहर जाकर देखा तो कुछ महिलाएं ग्राउंड फ्लोर के सामने मैदान में बने समर्सिबल पर नहाने जा रहीं थीं। हमने उनसे पूछा कि ठण्ड में 1 बजे, इतनी रात को नहाने जा रहीं हैं? उनका जवाब आया कि अभी नहीं जाएंगे तो सुबह बैठने के लिए जगह नहीं मिलेगी।
आस्था और विश्वास का इस स्तर तक का जूनून देखकर मैं थोड़ा आश्चर्यचकित भी हुआ। ठंड रात में मैं घर के बारजे पर खड़ा था। मंद-मंद चल रही हवाओं के बीच मन में सवालों के ढेर लगने लगे। जैसे- ऐसा क्या है बागेश्वर धाम वाले बाबा में कि लोग इतनी ठण्ड वाली रात में नहाकर अभी से पंडाल में जा रहे हैं। क्या वाकई में वो चमत्कार करते हैं? दूसरे पल जब उनके दिक्कतें और और परेशानियों को देखता जिसके लिए वो वहां पहुंचे थे तो ठंडी रात में नहाना जैसी चीजें छोटी लगने लगतीं।
जिसका इलाज कहीं नहीं हो सका या जिसके पास महंगे इलाज के पैसे नहीं हैं। जो हर जगह से अपनी सभी उम्मीदों को खो चूका हो। वही तो वहां पहुंच रहा था। उनमें शायद बहुतों को अब दवा से ज्यादा दुआओं की जरुरत थी। उनको विश्वास था कि बागेश्वर धाम वाले बाबा अगर एक बार उनकी पर्ची बना दें तो उनकी सभी दिक्कतें दूर हो जाएंगी।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण के हिसाब से बात करें तो यह एक बातचीत और बहस का मुद्दा हो सकता है। और होना भी चाहिए। लेकिन, जिस चीज से जिसकी आस्था जुड़ी हो, विश्वास जुड़ा हो, मान्यताएं जुड़ीं हों, वह उसका निजी मामला बन जाता है। एक कहावत है न कि ‘मानो तो देव नहीं तो पत्थर’ इसी कथन की प्रमाणिकता शायद वहां भी हो रही थी।
ढ़ेर सारे सवालों के मिले कुछ जवाब से हम संतुष्ट नहीं थे। लेकिन,सुबह जल्दी जागना था इसलिए रात के करीब 2 बजे हम सोने चले गए।
समय: सुबह के 7 बजे, जगह: कार्यक्रम का पंडाल
कवरेज के लिए हम सुबह 7 बजे पंडाल में पहुंचे। लोगों की भीड़ रात से ही जुटना शुरू हो चुकी थी। पुलिस और प्रशासन के लोग अपनी ड्यूटी पर मुस्तैद थे। मेजा के SDM ने बताया कि सुरक्षा के चाक चौबंद व्यवस्था है। करीब 2 हजार पुलिस के जवान सुरक्षा में तैनात थे।
DJ पर भक्ति गाने बज रहे थे। पुरे स्टेज को फूलों से सजाया गया था। पंडाल में बड़ी-बड़ी LED स्क्रीन लगाई गई थीं। जिससे जो पीछे बैठे हैं उनको भी साफ-साफ अपने बाबा के दर्शन हो सकें।
2 घंटे बाद 9 बजे
मंच पर भक्ति गीत गाने के लिए कुछ स्थानीय गायक बुलाए गए थे। और आल्हा की मशहूर गायिका संजू बघेल भी भक्ति गीत गाने पहुंची थीं। इन सबने एक-एक करके गाने शुरू किए। पब्लिक में मौजूद महिलाएं, लड़कियां, युवाओं ने भक्ति गानों पर डांस करना शुरू कर दिया था।
11 बजे
भीड़ बढ़ने लगी थी। पंडाल में एंट्री के लिए बनाए गए सुरक्षा स्कैनर को लोग धत्ता बताकर जबरदस्ती घुसने लगे थे। पुलिस के पास अउ कोई विकल्प नहीं था क्योंकि कार्यक्रम स्थल के दोनों बॉउंड्री पर 15 फीट ऊंची और 700 फीट लंबी दिवाल बनाई गई थी। इसलिए एक साथ को इतनी भीड़ को एक ही स्कैनर से एंट्री करा पाना मुश्किल था। भगदड़ का खतरा उत्पन्न हो जाता।
दोपहर 12 बजे
तय कार्यक्रम के हिसाब से बाबा के आने का समय हो चूका था। लोग उत्सुक थे। बाबा किसी भी क्षण आ सकते हैं। मंच से घोषणा हुई कि बागेश्वर धाम वाले बाबा आ रहे हैं। रास्ते में हैं। उनके अनुयायियों के आंखों में उम्मीद की चमक साफ देखी जा सकती थी। भीड़ इतनी हो चुकी थी कि लोग अंदर से बाहर और बाहर से अंदर नहीं जा सकते थे। लोग भूखे थे, प्यासे थे लेकिन उनके अंदर जोश की कमी नहीं थी।
दोपहर 2 बजे, बाबा जाम में फंस गए थे
दोपहर के 2 बज चुके थे। मीडिया कर्मियों से लेकर प्रशासन और भक्तों में यह जानने की जिज्ञासा बढ़ती जा रही थी कि वो कब तक आएंगे? कहां पहुंचे हैं? प्रशासन के अधिकारी ने बताया कि भक्तों की सड़कों पर इतनी भीड़ है कि वह जाम में फंस गए हैं।
दोपहर 3 बजे इंतजार की घड़ियां खत्म हुईं
दोपहर 3 बजे घोषणा की गई कि बाबा आ रहे हैं। चंद मिनटों में बागेश्वर धाम वाले बाबा पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री पधार चुके थे। पब्लिक खड़े होकर उनका स्वागत और अभिनंदन कर रही थी। कोई हाथ जोड़े खड़ा था तो कोई दोनों हाथों को ऊपर किए उनको प्रणाम कर रहा था।
पंडित शास्त्री ने सबका अभिवादन स्वीकार किया। दोनों हाथों को जोड़कर सबको नमस्कार किया। बालाजी की मूर्ति की पूजा करके वो तख्त पर बैठे। देर से आने के लिए सबसे माफी भी मांगी। 20-25 मिनट तक उन्होंने सनातन धर्म, धर्म परिवर्तन, बागेश्वर धाम सरकार, और विवादों के बारे में बातें कि।
इसके बाद उन्होंने अर्जी लगाने की घोषणा की और एक-एक करके कुल 10 लोगों की अर्जियां लगीं।
सबसे चर्चित 5 अर्जियों कि कहानियां ऊपर लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं।
Published on:
07 Feb 2023 10:05 am
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