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Alwar: हंस सरोवर डूब क्षेत्र में बन रहा EV चार्जिंग स्टेशन, जल संसाधन विभाग ने नोटिस में किया बड़ा ‘खेल’

अलवर में हंस सरोवर के डूब क्षेत्र में बन रहे 50 बसों के ईवी (EV) चार्जिंग स्टेशन को जल संसाधन विभाग ने निर्माण रोकने के लिए जिस प्रोजेक्ट मैनेजर को नोटिस थमाया, उसमें उसके विभाग का नाम तक नहीं लिखा।
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ev charging station

निर्माणाधीन चार्जिंग स्टेशन (फोटो - पत्रिका)

राजस्थान के अलवर में हंस सरोवर के डूब क्षेत्र में बन रहे 50 बसों के ईवी (EV) चार्जिंग स्टेशन को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। जल संसाधन विभाग ने निर्माण रोकने के लिए जिस प्रोजेक्ट मैनेजर को नोटिस थमाया, उसमें उसके विभाग का नाम तक नहीं लिखा, जिससे विभागीय मिलीभगत के गंभीर आरोप लग रहे हैं।

यह पूरा मामला अलवर के ऐतिहासिक हंस सरोवर की जमीन से जुड़ा हुआ है। नियमों को ताक पर रखकर सरोवर के डूब क्षेत्र (कैचमेंट एरिया) में 50 इलेक्ट्रिक बसों के लिए एक बड़ा ईवी चार्जिंग स्टेशन तैयार किया जा रहा है। मामले में सबसे बड़ा कारनामा जल संसाधन विभाग (वाटर रिसोर्सेज डिपार्टमेंट) का सामने आया है। विभाग ने इस पूरे प्रोजेक्ट की सर्वे रिपोर्ट देने में न सिर्फ देरी की, बल्कि जब निर्माण कार्य शुरू हो गया, तो केवल कागजी खानापूर्ति के लिए एक नोटिस जारी कर दिया।


हैरानी की बात यह है कि विभाग ने जिस प्रोजेक्ट मैनेजर को यह लीगल नोटिस भेजा, उसमें उसके विभाग के नाम का जिक्र तक नहीं किया गया। मामले के जानकारों और एक्सपर्ट्स का कहना है कि जल संसाधन खंड ने केवल अपना पल्ला झाड़ने और खुद को कानूनी कार्रवाई से बचाने के लिए यह किया है। नियम के मुताबिक, विभाग को इस अवैध निर्माण के खिलाफ सीधे जिला प्रशासन और यूआईटी (अर्बन इंप्रूवमेंट ट्रस्ट) को पत्र लिखना चाहिए था, क्योंकि जमीन का आवंटन यूआईटी ने ही किया था और उसी ने कार्यदायी संस्था को जमीन हैंडओवर की थी।

NOC के खेल में घिरे अफसर

स्थानीय लोगों और पर्यावरण प्रेमियों का आरोप है कि जल संसाधन विभाग आजकल शहर में कमर्शियल और अन्य बड़े प्रतिष्ठानों को धड़ल्ले से एनओसी (NOC) बांटने के खेल में लगा हुआ है। विभाग का जो असली काम है, यानी जलस्रोतों और बांधों की रक्षा करना उसे छोड़कर बाकी सारे काम किए जा रहे हैं। यही वजह है कि अलवर के गौरव हंस सरोवर और उसकी कीमती जमीन को यह विभाग भू-माफियाओं और निर्माण एजेंसियों से नहीं बचा पाया, जबकि जिले के सभी छोटे-बड़े बांध इसी विभाग के अधीन आते हैं।

इस पूरे घालमेल और जनता से जुड़े संवेदनशील मुद्दे पर जब जल संसाधन विभाग के एक्सईएन (XEN) से उनका पक्ष जानने की कोशिश की गई, तो उन्होंने हमेशा की तरह फोन उठाना भी मुनासिब नहीं समझा। अफसरों की यह चुप्पी विभाग की कार्यशैली को पूरी तरह कटघरे में खड़ा करती है।

अब नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) जाने की तैयारी में पर्यावरण प्रेमी

हंस सरोवर के अस्तित्व पर मंडराते संकट को देखते हुए अब अलवर के पर्यावरण प्रेमी और जागरूक नागरिक बेहद गुस्से में हैं। जब मामला पूरी तरह सार्वजनिक हो गया है, तब भी जिला प्रशासन या सरकार की तरफ से निर्माण कार्य को रोकने की कोई ठोस पहल नहीं की जा रही है।

प्रशासन के इस सुस्त और उदासीन रवैये को देखते हुए अब पर्यावरणविदों ने इस पूरे मामले को दिल्ली स्थित नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) में ले जाने की पूरी तैयारी कर ली है। पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि वे किसी भी कीमत पर सरोवर के कैचमेंट एरिया में पक्का निर्माण नहीं होने देंगे और दोषी अधिकारियों को कोर्ट के चक्कर काटने पड़ेंगे।