
अलवर की जीत : 15 घंटे बाद लौटी खुशियां, शहर ने ली राहत की सांस
रविवार रात का घनघोर संकट सोमवार सुबह भोर की किरणों के साथ ही उम्मीद के उजास में बदल गया। दिन के दूसरे पहर के आते ही उल्लास छा गया। इसके साथ ही अलवर का विश्वास और सामूहिक चेतना फिर विजयी हुए। व्यापारी का अपहरण हुआ तो 15 घंटे में सकुशल घर वापसी हो गई। बदमाश धरे गए। कुछ नकारा किस्म के लोग बिना वजह इसका भी श्रेय ले रहे हैं। जबकि असली श्रेय अलवर की जनता को है। इसका श्रेय उन व्यापारियों को है, दोस्तों को है जो मुकेश मित्तल के अपहरण के बाद रातभर अपने स्तर पर उन्हें ढूंढते रहे। सुबह मुकेश की कार को लावारिस हालात में उन्होंने ही ढूंढा। इसके बाद अपहर्ताओं के चंगुल से छूटे मुकेश को भी शहर के नागरिकों ने सुरक्षित पुलिस तक पहुंचाया। पुलिस के प्रयास भी रंग लाए। शातिर अपराधियों को परंपरागत पुलिसिंग से ही दबोचा गया।
पुलिस कतई इस मुगालते में न रहे कि यह केस उनके बूते हल हुआ है। पुलिस के दफ्तर के 15 मीटर दूर रात 10 बजे ही अपराध हो जाता है। अपराधी आसानी से शहर में घूमते रहते हैं। यदि वाकई में कोई गश्त होती तो अपराधी अपहरण का दुस्साहस तक नहीं करते। पुलिस को ध्यान देना होगा कि अलवर धीरे-धीरे 20 साल पहले वाला मेरठ, बरेली, सहारनपुर सरीखा अपराध क्षेत्र बनता जा रहा है। यहां आए दिन ऐसे अपराध हो रहे हैं जो तत्काल राष्ट्रीय सुर्खियां बन जाते हैं। बहरोड़, नीमराणा, भिवाड़ी, खैरथल के साथ ही अलवर शहर इन अपराधियों की सीधी निगाह में है। घटनाएं गिनाने बैठेंगे तो अंत ही नहीं है। जनता को समझना होगा कि अब जागरुकता जरूरी है। छोटी-छोटी घटनाओं को तवज्जो नहीं देने से ही बड़े अपराध होते हैं। यूं भी कह सकते हैं कि अपराधी धीरे-धीरे बड़े अपराधी हो जाते हैं।
पिछले छह माह में ही अलवर शहर में राह चलते लोगों से मोबाइल लूट, चेन स्नेचिंग जैसी दर्जनों घटनाएं हुई हैं। इनमें से शायद ही कोई पकड़ा गया हो। अगर पीडि़त रसूखदार होता है तो माल बरामद कर कुछ ही दिन में घर तक पहुंचा दिया जाता है। जबकि अपराधी का पता ही नहीं चलने दिया जाता है। इस मिलीभगत के खेल के कारण ही अपराधी बेखौफ हैं। जनता को जागरूक होने की जरूरत है। अच्छी बात ये है कि शहर में इन दिनों श्रीराम कथा चल रही है। रामकथा की तरह यहां भी हरण हुआ और दुष्टों को दबोचा गया। राम कथा में कई सुंदर चौपाई आती हैं। इन्हें जीवन में उतारना जरूरी है। अलवरवासी भी इन पर गौर कर सकते हैं। अंत में बस इतना ही कि, बिनय न माने जलधि जड़। गए तीन दिन बीत।। बोले राम सकोप तब। भय बिनु होय न प्रीत। अपराधियों में भय होना जरूरी है। पुलिस को समझना होगा कि उनका स्लोगन आमजन में विश्वास, अपराधियों में भय। धीरे-धीरे शीर्षासन कर चुका है।
Updated on:
18 Sept 2018 03:49 pm
Published on:
18 Sept 2018 03:49 pm
