
representative picture (AI)
Loss of greenery: औद्योगिक विकास और तेजी से फैलते शहरीकरण के बीच अलवर अब एक नए पर्यावरणीय संकट की ओर बढ़ रहा है। शहर में घटती हरियाली के कारण 'अर्बन हीट आइलैंड' (शहरी ऊष्मा द्वीप) का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। रिमोट सेंसिंग एवं भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआइएस) आधारित वैज्ञानिक अध्ययन में सामने आया है कि जिन क्षेत्रों में हरित आवरण कम हुआ है, वहां भूमि सतह का तापमान (लैंड सरफेस टेम्परेचर) काफी अधिक दर्ज किया गया है।
अध्ययन के अनुसार, अलवर शहर के लगभग 50 प्रतिशत हिस्से में हरित आवरण (एनडीवीआइ) कम पाया गया। दक्षिण और दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र सर्वाधिक गर्म दर्ज किए गए, जबकि उत्तर दिशा में अपेक्षाकृत अधिक हरियाली होने के कारण तापमान कम रहा। शोध में हरित आवरण सूचकांक (एनडीवीआइ) और भूमि सतह तापमान (एलएसटी) के बीच स्पष्ट ऋणात्मक संबंध पाया गया।
यानि जहां हरियाली अधिक है, वहां सतह का तापमान अपेक्षाकृत कम है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि हरित क्षेत्र लगातार घटते रहे, तो आने वाले वर्षों में अलवर में हीट वेव, ऊर्जा खपत और जल संकट जैसी समस्याएं और गंभीर हो सकती हैं। यह शोध अलवर शहर की निवासी दिव्या चौहान ने किया।
अध्ययन में लैंडसैट-8 उपग्रह से प्राप्त आंकड़ों और जीआइएस तकनीक का उपयोग किया गया। उपग्रह चित्रों के विश्लेषण के माध्यम से शहर के विभिन्न हिस्सों में हरित आवरण और भूमि सतह तापमान का आकलन किया गया। शोध का उद्देश्य शहरी विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए वैज्ञानिक आधार उपलब्ध कराना है, ताकि भविष्य की नगर नियोजन प्रक्रिया अधिक टिकाऊ और पर्यावरण अनुकूल बन सके।
पिछले एक दशक में अलवर में आवासीय कॉलोनियों, व्यावसायिक परिसरों, औद्योगिक क्षेत्रों और सड़क नेटवर्क का तेजी से विस्तार हुआ है। इसके साथ ही, खुले भू-भाग और पेड़-पौधों की संख्या लगातार घटती गई। पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, कंक्रीट, सीमेंट और डामर की सतहें दिनभर सूर्य की ऊष्मा को अवशोषित कर देर रात तक छोड़ती रहती हैं। इसी कारण शहर का तापमान आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक हो जाता है, जिसे अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव कहा जाता है।
शहर में बढ़ते तापमान से हीट स्ट्रॉक, डिहाइड्रेशन, हैजा तथा अन्य गर्मीजनित बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। अत्यधिक गर्मी के कारण एयर कंडीशनर और अन्य कूलिंग उपकरणों का उपयोग बढ़ने से बिजली की मांग और कार्बन उत्सर्जन दोनों में वृद्धि होती है। पानी की खपत बढ़ने से भविष्य में शहरी जल संकट और गहरा सकता है।
शहर की इमारतों पर बड़े पैमाने पर सोलर पैनल लगाए जाएं और व्यापक पौधरोपण कर हरित क्षेत्र बढ़ाए जाएं, ताकि तापमान नियंत्रित रहे। भवनों और सड़कों के निर्माण में ऐसी सामग्री व डिजाइन अपनाए जाएं, जो सूर्य की ऊष्मा का कम अवशोषण करें। साथ ही सार्वजनिक परिवहन, इलेक्ट्रिक वाहनों और ऊर्जा दक्ष भवनों को बढ़ावा देकर हीट आईलैंड प्रभाव और प्रदूषण दोनों को कम किया जा सकता है - प्रो. रामनंद यादव, अध्यक्ष साइंटिस्ट सोसायटी ऑफ इंडिया
Updated on:
21 Jul 2026 11:55 am
Published on:
21 Jul 2026 11:22 am
